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Bhasma Holi of Kashi: रंग-गुलाल से नहीं चिता की भस्म से खेली जाती है होली
ये तो हम सभी जानते हैं कि होली रंगों का त्योहार है। इस दिन सभी एक दूसरे को रंग-गुलाल लगाकर इस पर्व की बधाई देते हैं। मगर क्या आपने कभी चिता की भस्म से खेले जाने वाली होली के बारे में सुना है। जी हां, श्मशान की चिता की राख को रंग की तरह इस्तेमाल करके होली खेलने की यह प्रथा उत्तर प्रदेश के वाराणसी की है।

पूरी दुनिया में केवल काशी ही ऐसी जगह है जहां भस्म से होली खेली जाती है। काशी की भस्म होली को मसान होली और भभूत होली भी कहा जाता है।

कब और कहां खेली जाती है भस्म होली
होली पर्व की धूम अब लगभग पूरे देश में देखने को मिलती है। कई स्थानों पर इसे मनाने के कुछ विशेष तरीके भी हैं। इन सबके बीच वाराणसी की भस्म होली का अपना ही महत्व है। रंगभरी एकादशी के अगले दिन चिता की राख से होली खेली जाती है। यह हर साल काशी के महाश्मशान हरिश्चन्द्र घाट और मणिकर्णिका घाट पर आयोजित की जाती है। इस दौरान पूरे शहर की हवा में भस्म घुल जाती है, तो वहीं नागा साधू और अघोरी अलग अलग करतब दिखाते हैं। भोलेबाबा के भक्त अपने ही अंदाज में होली का आनंद लेते हैं।

भस्म होली का महत्व
बाबा विश्वनाथ की नगरी में हर साल मसान होली बड़े ही जोश और उत्साह के साथ मनाई जाती है। ऐसा माना जाता है कि देवी-देवता, गंधर्व, यक्ष इस उत्सव का हिस्सा बनते हैं। लोगों की आस्था है कि स्वयं भगवान भोलेनाथ अपने भक्तों के साथ होली खेलने के लिए घाट पर आते हैं। आम दिनों में जो इंसान चिता की राख से कोसों दूर रहता है, वो इस दिन एक चुटकी राख प्रसाद के रूप में पाने के लिए पूरी श्रद्धा के साथ इंतजार करता है।

मसान होली का धार्मिक संबंध
ऐसा माना जाता है कि रंगभरी एकादशी के दिन ही भगवान शिव माता पार्वती का गौना कराकर लाये थे। इसी ख़ुशी में उत्सव का आयोजन किया गया। भोलेनाथ ने अपने गणों के साथ काशी में रंग और गुलाल के साथ होली खेली थी। मगर इस दिन वो भूत, प्रेत, आत्मा, किन्नर, पिशाच आदि के साथ होली नहीं खेल पाए थे। यही वजह है कि रंगभरी एकादशी के एक दिन बाद भगवान शिव ने भूत-प्रेत और आत्माओं के साथ होली खेली थी और तभी से भस्म होली खेली जाती है।

भस्म होली कैसे खेली जाती है?
बनारस के मणिकर्णिका घाट पर जलती चिताओं के बीच में भस्म से होली खेली जाती है। इसकी शुरुआत करने से पहले बाबा महाश्मशान नाथ और मशान काली माता की मध्याह्न आरती की जाती है। फिर इन्हें चिता की भस्म राख और गुलाल चढ़ाया जाता है। इसके बाद महादेव के भक्त पूरे उत्साह के साथ भस्म होली खेलना शुरू करते हैं।
नोट: यह सूचना इंटरनेट पर उपलब्ध मान्यताओं और सूचनाओं पर आधारित है। बोल्डस्काई लेख से संबंधित किसी भी इनपुट या जानकारी की पुष्टि नहीं करता है। किसी भी जानकारी और धारणा को अमल में लाने या लागू करने से पहले कृपया संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें।



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