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Papmochani Ekadashi Katha: पाठ ही नहीं, केवल सुनने भर से भी होगा कल्याण
चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम पापमोचनी एकादशी है। इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य के सभी पापों का नाश हो जाता है। यह सब व्रतों में से उत्तम व्रत माना गया है। पापमोचनी एकादशी का व्रत करने से ही नहीं बल्कि इससे जुड़ी कथा के श्रवण व पठन से समस्त पापों का नाश हो जाता है। आज इस लेख के माध्यम से आप भी जरूर जानें पापमोचिनी एकादशी से जुड़ी कथा के बारे में।

पापमोचनी एकादशी व्रत कथा
एक समय देवर्षि नारदजी ने जगत् पिता ब्रह्माजी से कहा महाराज! आप मुझसे चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी विधान कहिए।
ब्रह्माजी कहने लगे कि हे नारद! चैत्र मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी पापमोचनी एकादशी के रूप में मनाई जाती है। इस दिन भगवान विष्णु का पूजन किया जाता हैं। इसकी कथा के अनुसार प्राचीन समय में चित्ररथ नामक एक रमणिक वन था। इस वन में देवराज इन्द्र गंधर्व कन्याओं तथा देवताओं सहित स्वच्छंद विहार करते थे।
एक बार मेधावी नामक ऋषि भी वहां पर तपस्या कर रहे थे। वे ऋषि शिव उपासक थे। एक मंजुघोषा नामक अप्सरा युवा ऋषि के पास गयी। मुनि अप्सरा के हाव भाव, नृत्य, गीत तथा कटाक्षों पर काम मोहित हो गए। रति-क्रीडा करते हुए कई वर्ष बीत गए।

एक दिन मंजुघोषा ने देवलोक जाने की आज्ञा मांगी। उसके द्वारा आज्ञा मांगने पर मुनि को भान आया और उन्हें आत्मज्ञान हुआ कि वह शिव की तपस्या से विरत हो चुके हैं, उन्हें तब उस अप्सरा पर बहुत क्रोध आया और उन्होंने अप्सरा को पिशाचनी होने का श्राप दे दिया।
श्राप से दुःखी होकर वह ऋषि के पैरों पर गिर पड़ी और श्राप से मुक्ति के लिये अनुनय करने लगी। अप्सरा की याचना से द्रवित हो मेधावी ऋषि ने उसे विधि सहित चैत्र कृष्ण एकादशी का व्रत करने के लिये कहा। भोग में निमग्न रहने के कारण ऋषि का तेज भी लोप हो गया था, अतः ऋषि ने भी इस एकादशी का व्रत किया, जिससे उनका पाप नष्ट हो गया। उधर अप्सरा भी इस व्रत के प्रभाव से पिशाच योनि से मुक्त हो गई। पाप से मुक्त होने के पश्चात अप्सरा को सुन्दर रूप प्राप्त हुआ और वह स्वर्ग के लिये प्रस्थान कर गई।
अत: हे नारद! जो कोई मनुष्य विधिपूर्वक इस व्रत को करेगा, उसके सारों पापों की मुक्ति होना निश्चित है। और जो कोई इस व्रत के महात्म्य को पढ़ता और सुनता है उसे सारे संकटों से मुक्ति मिल जाती है।



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