छिपी हुई करुणा

The Camouflaged Compassion
एक बार एक जैन गुरु अपने गुरु का जन्मदिन मना रहे थे। उनसे किसी ने कहा की वह अपने गुरु का जन्मदिन क्यों मना रहे हैं जब कि उनके गुरु ने कई बार आग्रह करने के बाद भी उन्हें शिष्य बनाने से मना कर दिया था।

उन्होंने कहा कि गुरु ने आपको हर बार शिष्य बनाने से मना कर दिया था फिर भी आप उनका जन्मदिन मना रहें हैं। उनका जन्मदिन तो उन शिष्यों को मानना चाहिए जिनको उन्होंने शिष्य के रूप में स्वीकार किया था।

गुरूजी हँसे और कहा, "मैं जश्न मना रहा हूँ क्योंकि उन्होंने मुझे मना कर दिया था। मैंने अब उनकी दया को समझा है। अगर वह मुझे स्वीकार करते को मैं केवल एक नकलची बन जाता। उन्होंने मुझे छोड़ दिया इसलिए मैंने अपने पैरों पर खड़ा होना शुरू किया।

धीरे-धीरे मेरी हताशा ने मुझे किसी गिरे हुए को उठाने के लिए प्रेरित किया। इस प्रकार उन्होंने मेरी मदद की। इसलिए वो मेरे गुरु हैं जिन्होंने वास्तव में मुझे अपनी अस्वीकृति में भी स्वीकार किया।

Story first published: Wednesday, September 5, 2012, 16:53 [IST]
Desktop Bottom Promotion