Shukra Pradosh Vrat Katha: शुक्र प्रदोष व्रत के दिन जरूर पढ़ें यह कथा, महादेव दूर करेंगे जीवन के सभी दुख

Shukra Pradosh Vrat Katha: हिंदू धर्म में त्रयोदशी तिथि भगवान शिव को समर्पित है, जिसे हम प्रदोष व्रत के नाम से जानते हैं। आज 30 जनवरी को प्रदोष व्रत रखा जाएगा, यह व्रत शुक्रवार के दिन पड़ता है, तो इसे 'शुक्र प्रदोष' कहा जाता है। यह व्रत न केवल भगवान भोलेनाथ की असीम कृपा दिलाता है, बल्कि कुंडली में शुक्र ग्रह की स्थिति को भी मजबूत करता है, जिससे जीवन में भौतिक सुख और वैभव बढ़ता है।

शास्त्रों के अनुसार, प्रदोष काल में की गई पूजा और व्रत कथा का श्रवण दरिद्रता का नाश करता है। आइए जानते हैं शुक्र प्रदोष व्रत की वह पौराणिक कथा, जिसे सुनने से भक्तों के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं।

प्रदोष व्रत कब है? (Shukra Pradosh Vrat Date 2026)

साल 2026 में जनवरी के महीने का दूसरा प्रदोष व्रत 30 जनवरी, शुक्रवार को रखा जाएगा। दरअसल, त्रयोदशी तिथि 30 जनवरी 2026, सुबह 8:15 बजे से प्रारंभ होगी और 31 जनवरी 2026, सुबह 06:40 बजे समाप्त होगी। बता दें कि प्रदोष व्रत में पूजा साय काल में होती है तो ऐसे में 30 जनवरी को ही प्रदोष व्रत रखा जाएगा।

शुक्र प्रदोष व्रत की पौराणिक कथा (The Full Story)

पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन काल में एक विधवा ब्राह्मणी अपने पुत्र के साथ रहती थी। वह रोज सुबह भिक्षा मांगने निकलती और जो कुछ मिलता उससे अपना और अपने पुत्र का पेट पालती थी। एक दिन भिक्षा मांगकर लौटते समय उसे नदी किनारे एक बालक मिला, जो बहुत ही सुंदर और तेजस्वी था। वह विदर्भ देश का राजकुमार था, जिसके पिता (राजा) को दुश्मनों ने युद्ध में मार दिया था और राज्य छीन लिया था। ब्राह्मणी को उस पर दया आ गई और वह उसे अपने घर ले आई और अपने पुत्र की तरह पालने लगी।

कुछ समय बाद, ब्राह्मणी दोनों बालकों को लेकर ऋषि शाण्डिल्य के आश्रम गई। वहां ऋषि ने उसे प्रदोष व्रत करने की सलाह दी। ब्राह्मणी ने विधि-विधान से व्रत शुरू किया। एक दिन दोनों बालक वन में विहार कर रहे थे, तभी राजकुमार ने गंधर्व कन्याओं को देखा। राजकुमार एक गंधर्व कन्या 'अंशुमती' पर मोहित हो गया। भगवान शिव की कृपा और प्रदोष व्रत के प्रभाव से गंधर्वराज ने अपनी पुत्री का विवाह उस राजकुमार से कर दिया। इसके बाद राजकुमार ने गंधर्व सेना की मदद से अपने खोए हुए राज्य को वापस जीत लिया। उसने ब्राह्मणी और उसके पुत्र को अपना मंत्री बनाया और ससम्मान महल में रखा।

जिस प्रकार उस ब्राह्मणी के प्रदोष व्रत करने से राजकुमार और उसके पुत्र के दिन फिरे, उसी प्रकार जो भक्त शुक्र प्रदोष का व्रत करता है और यह कथा पढ़ता है, महादेव उसके सभी दुख हर लेते हैं।

भगवान शिव की आरती (Lord Shiva Aarti)

जय शिव ओंकारा, भज जय शिव ओंकारा। ब्रह्मा विष्णु सदाशिव अर्द्धांगी धारा ॥ ॥ जय शिव ओंकारा... ॥

एकानन चतुरानन पंचानन राजे। हंसानन गरुड़ासन वृषवाहन साजे ॥ ॥ जय शिव ओंकारा... ॥

दो भुज चार चतुर्भुज दस भुज अति सोहे। त्रिगुण रूपनिरखता त्रिभुवन जन मोहे ॥ ॥ जय शिव ओंकारा... ॥

अक्षमाला बनमाला रुण्डमाला धारी। चंदन मृगमद सोहै भाले शशिधारी ॥ ॥ जय शिव ओंकारा... ॥

श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे। सनकादिक गरुणादिक भूतादिक संगे ॥ ॥ जय शिव ओंकारा... ॥

कर के मध्य कमंडलु चक्र त्रिशूल धर्ता। जगकर्ता जगभर्ता जगपालनकर्ता ॥ ॥ जय शिव ओंकारा... ॥

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका। प्रणवाक्षर के मध्ये ये तीनों एका ॥ ॥ जय शिव ओंकारा... ॥

काशी में विश्वनाथ विराजत नन्दी ब्रह्मचारी। नित उठि भोग लगावत महिमा अति भारी ॥ ॥ जय शिव ओंकारा... ॥

त्रिगुण शिवजी की आरती जो कोई नर गावे। कहत शिवानंद स्वामी मनवांछित फल पावे ॥ ॥ जय शिव ओंकारा... ॥

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