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Vat Purnima Vrat Katha: वट पूर्णिमा पर यहां पढ़ें पूरी व्रत कथा, महिलाओं को मिलेगा अखंड सौभाग्य का वरदान
Vat Purnima Vrat Katha: अखंड सौभाग्य और सुखी दांपत्य जीवन के लिए रखा जाने वाला वट पूर्णिमा व्रत इस साल 29 जून 2026, सोमवार को यानी आज मनाया जा रहा है। इस दिन सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और संतान की सुख-समृद्धि के लिए बरगद के पेड़ की पूजा करती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, वट पूर्णिमा का व्रत तब तक अधूरा माना जाता है जब तक कि सावित्री-सत्यवान की पौराणिक कहानी न सुनी जाए। आइए पढ़ते हैं यह पावन व्रत कथा।

वट पूर्णिमा पौराणिक व्रत कथा यहां पढ़ें
पौराणिक कथा के अनुसार, मद्र देश के राजा अश्वपति की एक अत्यंत गुणवान और सुंदर पुत्री थी, जिसका नाम सावित्री था। सावित्री ने अपने वर के रूप में द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान को चुना। सत्यवान बहुत ही धर्मात्मा और सर्वगुण संपन्न थे, लेकिन ज्योतिषीय गणना के अनुसार वे अल्पायु थे और विवाह के ठीक एक वर्ष बाद ही उनकी मृत्यु का योग था। नारद जी ने सावित्री को बहुत समझाया कि वे किसी अन्य से विवाह कर लें, लेकिन सावित्री अपने फैसले पर अडिग रहीं और उन्होंने सत्यवान से विवाह कर लिया। विवाह के बाद सावित्री अपने अंधे सास-पैसे और पति के साथ जंगल की कुटिया में रहने लगीं और पूरी निष्ठा से उनकी सेवा करने लगीं।
यमराज का धरती पर आगमन
जब सत्यवान की मृत्यु का वह निश्चित दिन आया, तो सत्यवान लकड़ी काटने के लिए जंगल जाने लगे। सावित्री भी उनके साथ चल दीं। जंगल में लकड़ी काटते समय अचानक सत्यवान के सिर में भयानक दर्द हुआ और वे एक वट वृक्ष (बरगद के पेड़) के नीचे सावित्री की गोद में सिर रखकर लेट गए। कुछ ही देर में वहां साक्षात प्राण हरने वाले यमराज प्रकट हुए और सत्यवान के सूक्ष्म प्राण लेकर दक्षिण दिशा की ओर चलने लगे।
सावित्री का यमराज के पीछे जाना और तीन वरदान
सावित्री भी यमराज के पीछे-पीछे चल पड़ीं। यमराज ने उन्हें बहुत रोका और कहा कि यह मृत्यु का अटल नियम है, तुम वापस लौट जाओ। लेकिन पतिव्रता सावित्री ने हार नहीं मानी और अपनी बुद्धिमत्ता व पातिव्रत्य धर्म के बल पर यमराज से तीन वरदान मांग लिए:
पहला वरदान: सावित्री ने अपने अंधे सास-ससुर की आंखों की रोशनी और खोया हुआ राजपाठ वापस मांग लिया।
दूसरा वरदान: उन्होंने अपने पिता के लिए सौ पुत्रों का वरदान मांगा।
तीसरा वरदान: अंत में सावित्री ने चतुराई से खुद के लिए सौ पुत्रों की माता बनने का वरदान मांग लिया।
यमराज ने बिना सोचे-समझे तथास्तु कह दिया। वरदान देने के बाद जब यमराज आगे बढ़े, तो सावित्री ने कहा, "हे प्रभु! आपने मुझे सौ पुत्रों की माता बनने का आशीर्वाद तो दे दिया, लेकिन मेरे पति के प्राण तो आप अपने साथ ले जा रहे हैं। एक पतिव्रता नारी अपने पति के बिना संतान को जन्म कैसे दे सकती है?"

सत्यवान को मिला जीवनदान
यमराज सावित्री की इस बुद्धिमत्ता और पतिभक्ति को देखकर निरुत्तर हो गए। वे समझ गए कि वे अपने ही वचन के जाल में फंस चुके हैं। प्रसन्न होकर यमराज ने सत्यवान के प्राणों को पाश से मुक्त कर दिया और सावित्री को अखंड सौभाग्य का वरदान देकर अंतर्ध्यान हो गए। सावित्री तुरंत उसी वट वृक्ष के पास लौट आईं जहां सत्यवान का मृत शरीर पड़ा था। उनके आते ही सत्यवान के शरीर में चेतना लौट आई और वे जीवित हो उठे।
वट पूर्णिमा पर बरगद के पेड़ (वट वृक्ष) की पूजा का महत्व
तभी से हिंदू धर्म में वट पूर्णिमा और वट सावित्री के दिन बरगद के पेड़ की पूजा का नियम शुरू हुआ।
त्रिदेव का वास: मान्यता है कि वट वृक्ष की जड़ में ब्रह्मा, तने में विष्णु और शाखाओं में भगवान शिव का वास होता है।
सूत बांधने का नियम: इस दिन महिलाएं वट वृक्ष के चारों ओर कच्चे सूत या कलावे को लपेटते हुए परिक्रमा करती हैं, जिससे उनके सुहाग की रक्षा होती है और दांपत्य जीवन की सभी परेशानियां दूर हो जाती हैं।



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