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Vat Savitri Vrat Katha 2025: इस व्रत कथा के बिना अधूरा है वट सवित्री व्रत, यहां पढ़ें संपूर्ण कथा
Vat Savitri Vrat Katha 2025: हिंदू धर्म में वट सावित्री व्रत का विशेष महत्व है। यह व्रत सुहागन स्त्रियां अपने पति की दीर्घायु, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि के लिए करती हैं। इस व्रत की कथा का वर्णन स्कंद पुराण में मिलता है, जिसमें सावित्री और सत्यवान की प्रेरणादायक कथा है।

कथा का आरंभ
बहुत समय पहले अश्वपति नामक एक धर्मात्मा राजा था, जिसकी कोई संतान नहीं थी। उसने प्रभास क्षेत्र के एक तीर्थ स्थान पर जाकर व्रत किया और ब्रह्माजी की प्रिया देवी सावित्री की पूजा की। देवी सावित्री प्रसन्न होकर उसे दर्शन दीं और कुछ समय बाद उसके घर एक दिव्य कन्या ने जन्म लिया। उस कन्या का नाम भी सावित्री रखा गया।
सावित्री बड़ी होकर अत्यंत सुंदर, तेजस्वी और गुणवान युवती बनी। जब वह विवाह योग्य हुई तो राजा अश्वपति ने उससे कहा कि वह स्वयं अपने लिए योग्य वर का चयन करे।
सत्यवान का चयन
सावित्री ने तीर्थ यात्रा के दौरान एक तपोवन में द्युमत्सेन नामक अंधे राजा के पुत्र सत्यवान को देखा, जो धर्मात्मा, सत्यव्रती और गुणों में श्रेष्ठ था। सावित्री ने मन ही मन उसे ही अपना पति मान लिया।
जब नारद मुनि ने राजा अश्वपति को बताया कि सत्यवान एक वर्ष बाद मृत्यु को प्राप्त होगा, तब भी सावित्री अपने निर्णय पर अडिग रही। उसने कहा कि एक बार किया गया वरण कभी बदला नहीं जाता। राजा ने बेटी की इच्छानुसार सावित्री और सत्यवान का विवाह करवा दिया।
सावित्री की दृढ़ता और तपस्या
विवाह के बाद सावित्री अपने सास-ससुर के साथ वन में रहने लगी और पति की मृत्यु की तिथि गिनती रही। जब वह दिन आया, तो सावित्री ने उपवास रखा और सत्यवान के साथ जंगल गई। जंगल में लकड़ियां काटते-काटते सत्यवान के सिर में तेज़ दर्द हुआ और वह सावित्री की गोद में सिर रखकर लेट गया। तभी सावित्री ने देखा कि यमराज स्वयं आए हैं और सत्यवान के प्राण लेने लगे हैं।
सावित्री और यमराज संवाद
सावित्री यमराज के पीछे चलने लगी और उन्हें धर्म, करुणा और नारी शक्ति का उपदेश देने लगी। यमराज उसकी दृढ़ता और निष्ठा से प्रसन्न होकर उसे वरदान देने लगे। सावित्री ने मांगा:
ससुर की दृष्टि वापसी,
खोया हुआ राज्य,
सौ पुत्रों का आशीर्वाद।
यमराज ने कहा - "ऐ पतिव्रता नारी! तुझे जो चाहिए, सो मिल जाए," और सत्यवान के प्राण लौटा दिए।
कथा का फल
सावित्री सत्यवान को लेकर आश्रम लौटी। धीरे-धीरे सास-ससुर को दृष्टि लौटी, खोया हुआ राज्य मिल गया और उन्हें सौ पुत्रों का सौभाग्य प्राप्त हुआ। यह सब देवी सावित्री के व्रत, श्रद्धा और दृढ़ निश्चय का फल था।
वट सावित्री व्रत पूजा विधि
- प्रातः स्नान कर सास-ससुर के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लें।
- वट वृक्ष (बरगद) के पास बैठकर पंचदेवों और भगवान विष्णु का आह्वान करें।
- तीन कुश और तिल लेकर ब्रह्मा और सावित्री देवी का ध्यान करें:
"ॐ नमो ब्रह्मणा सह सावित्र्यै इहागच्छ, इह तिष्ठ सुप्रतिष्ठिता भव"
- वट वृक्ष को जल, फूल, सिंदूर, नैवेद्य, पान अर्पित करें।
- आम या अन्य फल वट वृक्ष को अर्पित कर पति को वह फल प्रसाद रूप में खिलाएं।
- कच्चे सूत से वट वृक्ष की 7 या 21 बार परिक्रमा करें (108 बार श्रेष्ठ मानी गई है)।
- व्रत का पारण काले चने खाकर करें। क्योंकि काले चने के ही प्रसाद से सावित्री को अपने पति के प्राण वापस मिले थे।
वट सावित्री व्रत का महत्व
यह व्रत केवल एक कथा नहीं, बल्कि नारी के आत्मबल, श्रद्धा और प्रेम की प्रतीक है। इस व्रत को श्रद्धा से करने से दांपत्य जीवन में प्रेम, सौभाग्य और सुख-समृद्धि बनी रहती है।



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