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Gangaur 2025: कब से शुरू हो रहा है गणगौर का उत्सव 2025 में, जानें कब रखा जाएगा व्रत और पूजा विधि
गणगौर पूजा मुख्य रूप से राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात और उत्तर भारत के कुछ अन्य राज्यों में मनाई जाने वाली एक प्रमुख लोक पर्व है। यह पूजा माता पार्वती और भगवान शिव को समर्पित होती है। "गण" का अर्थ शिव और "गौर" का अर्थ पार्वती होता है। हिंदू धर्म में गणगौर व्रत को विशेष महत्व दिया गया है।
इसे चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है, जिसे तृतीया तीज के नाम से भी जाना जाता है। विवाहित और अविवाहित महिलाएं इस व्रत को श्रद्धा और भक्ति के साथ रखती हैं।

इस साल गणगौर कब से शुरू हो रहा है?
राजस्थान में गणगौर का त्योहार फाल्गुन माह की पूर्णिमा (होली) के दिन से शुरू होता है। इस साल गणगौर की पूजा 14 मार्च से आरंभ होगी, जो अगले 17 दिनों तक चलेगी। इन 17 दिनों के दौरान, महिलाएं भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमाएँ बनाकर उनकी पूजा करती हैं और विशेष भजन व गीत गाती हैं। इसके बाद चैत्र नवरात्रि के तीसरे दिन, महिलाएं सोलह श्रृंगार कर व्रत रखती हैं और शाम को गणगौर की कथा सुनती हैं। मान्यता है कि इस दिन माता पार्वती को जितने अधिक गहने अर्पित किए जाते हैं, उतना ही घर में सुख-समृद्धि बढ़ती है। पूजा के बाद, महिलाएं इन गहनों को अपनी सास, ननद, देवरानी या जेठानी को सौंप देती हैं।
गणगौर व्रत की तिथि
इस वर्ष गणगौर व्रत 31 मार्च को रखा जाएगा।
चैत्र शुक्ल तृतीया तिथि आरंभ: 31 मार्च, प्रातः 9:11 बजे
चैत्र शुक्ल तृतीया तिथि समाप्त: 1 अप्रैल, प्रातः 5:42 बजे
गणगौर पूजा विधि
गणगौर व्रत के दिन महिलाएं सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करती हैं। इसके बाद, मिट्टी से भगवान शिव और माता पार्वती की मूर्तियाँ बनाकर उन्हें सुंदर वस्त्र पहनाए जाते हैं। फिर विधिपूर्वक पूजा संपन्न की जाती है। भगवान शिव और माता पार्वती को चंदन, अक्षत, रोली, और कुमकुम अर्पित करें। माता पार्वती को श्रृंगार का सामान चढ़ाएं। भगवान शिव और माता पार्वती के समक्ष धूप और दीप जलाएं। उन्हें चूरमे का भोग अर्पित करें। एक थाली में चांदी का सिक्का, सुपारी, पान, दूध, दही, गंगाजल, हल्दी, कुमकुम और दूर्वा रखकर सुहाग जल तैयार करें। दूर्वा से इस सुहाग जल को भगवान शिव और माता पार्वती पर छिड़कें और घर के अन्य सदस्यों पर भी इसका छिड़काव करें।
गणगौर पूजा का महत्व
गणगौर पूजा का विशेष महत्व है, खासकर विवाहित, नवविवाहित और अविवाहित महिलाओं के लिए। मान्यता है कि इस व्रत को करने से महिलाओं के सुहाग की रक्षा होती है और उनका दांपत्य जीवन सुखमय रहता है। विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि के लिए इस व्रत को करती हैं। नवविवाहित महिलाएं इस व्रत को विशेष रूप से करती हैं क्योंकि यह उनके वैवाहिक जीवन की सुख-समृद्धि के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
अविवाहित कन्याएं इस व्रत को एक अच्छे वर की प्राप्ति के लिए करती हैं, जिससे उन्हें शिवजी के समान योग्य पति मिल सके।



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