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जानें इस्लाम में क्यों खास है जुमा की नमाज, जिसे कहा जाता है मुसलमानों की छोटी ईद
Importance Of Jumma Namaz: इस्लाम धर्म में सप्ताह का सबसे मुकद्दस दिन शुक्रवार माना गया है। इसे "यौमुल जुमा" यानी "इज्तेमा और बरकत का दिन" कहा जाता है। इस दिन की अहमियत इतनी ज्यादा है कि इसे ईदुल-मुस्लिमीन (मुसलमानों की छोटी ईद) भी कहा जाता है। जुमा की नमाज न सिर्फ इबादत का अहम हिस्सा है, बल्कि मुसलमानों की एकजुटता, भाईचारे और उम्मत की तालीम व तरबियत का भी जरिया है।
यही वजह है कि कुरआन और हदीस में इसकी फजीलत बार-बार बयान की गई है। आज हम जानते हैं कि इस्लाम में शुक्रवार का दिन क्यों खास माना जाता है और जुमा की नमाज का क्या महत्व होता है?
इस्लाम में शुक्रवार को पाक क्यों माना जाता है?
इस्लामी मान्यता के अनुसार, अल्लाह तआला ने इसी दिन हजरत आदम (अ.स.) को पैदा किया और इसी दिन उन्हें जन्नत में दाखिल किया गया। इस्लाम में माना जाता है कि कयामत का दिन भी शुक्रवार को ही कायम होगा। इस दिन बंदे की दुआएं और इस्तगफार खास तौर पर कबूल की जाती हैं। यही वजह है कि शुक्रवार मुसलमानों के लिए जमाअत, इल्म और एकता का दिन है।

जुमा की नमाज का महत्व
कुरआन की सूरह अल-जुमा (62:9) में अल्लाह तआला फरमाते हैं कि जब जुमा की नमाज के लिए पुकारा जाए तो कारोबार और व्यापार छोड़कर अल्लाह की याद की तरफ दौड़ो। जुमा की नमाज मुसलमानों के लिए फर्ज ए अईन है। यानी हर बालिग, आजाद, सेहतमंद और मर्द मुसलमान पर यह नमाज लाजिमी है। जुमा की नमाज सामूहिक इबादत है जो मस्जिद में जमात के साथ अदा की जाती है।
जुमा की नमाज की फजीलत
हफ्ते की सबसे अफजल नमाज - जुमा की नमाज को पांच वक्त की नमाजों से भी ज्यादा सवाब वाली कहा गया है।
गुनाहों की माफी - हदीस में है कि जो शख्स जुमा की नमाज सही तरीके से अदा करता है, उसके पिछले हफ़्ते के गुनाह माफ़ कर दिए जाते हैं।
सवाब में इज़ाफ़ा - मस्जिद में कदम रखते हुए हर कदम पर सवाब लिखा जाता है और गुनाह कम किए जाते हैं।
फ़रिश्तों की मौजूदगी - जुमा के दिन नमाज के वक्त मस्जिदों के दरवाजे पर फ़रिश्ते मौजूद रहते हैं और आने वालों के नाम दर्ज करते हैं।
दुआ की कबूलियत - जुमा के दिन एक खास घड़ी होती है जिसमें की गई दुआ को अल्लाह तआला ज़रूर कबूल करता है।
जुमा की नमाज से जुड़ी अहम सुन्नतें
जुमा की नमाज से पहले ग़ुस्ल (नहाना या हाथ-मुंह धोना) करना।
साफ-सुथरे कपड़े पहनना और इत्तार (खुशबू) लगाना।
मस्जिद जल्दी पहुंचना और सफो (कतारों) में आगे बैठना।
खुत्बा (जुमे का बयान) ध्यान से सुनना और खामोश रहना।
कुरान की सूरह अल-कहफ की तिलावत करना।
जुमा के दिन दरूद शरीफ की कसरत करना।
मस्जिद में दाखिल होते समय नफ़्ल नमाज अदा करना।



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