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Bhopal Gas Tragedy: ये हैं असल The Railway Man, जिन्होंने उस जहरीली रात में बचाई अनगिनत जाने
Bhopal Gas Tragedy: दुनिया की सबसे बड़ी मानवीय त्रासदी में से एक 1985 में हुए भोपाल गैस कांड को 39 साल पूरे हो गए है। आज भी इस उस स्याह रात के जख्म लोगों में मौजूद हैं। इस ज़हरीली गैस की चपेट में जो भी आए, उन्होंने या तो अपनो को खोया यार अपनी जान गंवा दी। किसी ने अपनी आवाज़ खो दी तो किसी ने अपनी आंखें। जो लोग बच गए वो खतरनाक बीमारियों के शिकार बन गए। वो एक ऐसी दर्दनाक रात थी, जिसे याद करके भोपालवासी सिहर उठते हैं और पूरा देश उसे याद करके दुख मनाता है।
हर कोई अपनी जान बचाने की जद्दोजहद में था, लेकिन इन सब के बीच एक शख्स ऐसा भी था, जिसने न तो खुद की परवाह की और न ही अपने परिवार की। उसने अपने एक फैसले से सैकड़ों की जान बचाई। लेकिन वो अपने 3 मासूम बच्चों और पत्नी की जान नहीं बचा पाया।

उस शख़्स का नाम था ग़ुलाम दस्तगीर। जिन्होंने भोपाल जंक्शन पर अपनी सूझबूझ से हजारों राहगीरों की जान बचाई। हाल ही में नेटफ्लिक्स में रिलीज हुई भोपाल त्रासदी पर आधरित 'द रेलवे मैन' में केके मेनन का किरदार इफ्तेकार सिद्दिकी असल में ग़ुलाम दस्तगीर से ही प्रेरित है। भोपाल गैस त्रासदी को अब पूरे 39 साल पूरे हो रहे हैं, इस मौके पर जानते हैं इस गुमनाम हीरो की असल दास्तां-
2-3 दिसंबर की काहानी
गुलाम भोपाल स्टेशन पर डेप्यूटी स्टेशन सुप्रीटेंडेंट हुआ करते थे। रोजाना की तरह 2 और 3 दिसंबर की खोफनाक रात को भी वो ड्यूटी के दौरान स्टेशन पर गश्त करने निकले थे। इस दौरान उन्हें आंखों में जलन और गले में खुजली महसूस हुई। एक इंटरव्यू में उन्होंने खुद बताया था कि, उस वक़्त उनके सामने गोरखपुर-कानपुर एक्सप्रेस खड़ी थी, जिसे स्टेशन से छूटने में करीब 20 मिनट बाकी थे।

उन्हें खुद की हालत और सामने खड़ी ट्रेन में लोगों की बिगड़ती तबीयत को देखते हुए होने वाली किसी बड़ी अनहोनी का अंदेशा हो गया था। वो तुरंत दौड़कर अपने सीनियर्स के पास पहुंचे और ट्रेन को तय समय से पहले प्लेटफॉर्म से रवाना करने का अनुरोध किया। हालांकि, ये फैसला लेना भी एकदम सही नहीं था, रेल प्रबंधन के आला अधिकारी इस पर सहमत नहीं थे। उन्होंने कहा कि इस ट्रेन को भले ही कहीं दूर ले जाकर खड़ा करवाया जाए, अगर इसमें कोई गलती हुई या होगी, तो उसकी पूरी जिम्मेदारी मेरी होगी। हालांकि, सीनियर्स को भी उस समय तक कुछ गलत होने का आभास होने लगा था, उसके बाद बिना समय गंवाएं स्टेशन पर खड़ी ट्रेन को तय समय से पहले रवाना करने का निर्णय ले लिया गया।
उन्होंने बिदिशा और इटारसी जैसे पास के स्टेशनों के वरिष्ठ कर्मचारियों को सतर्क कर दिया और तुरंत सभी ट्रेनों को भोपाल से रवाना करने का फ़ैसला किया। स्टेशनमास्टर के इस सूझ बूझ भरे एक फैसले ने उस दिन अनगिनत ज़िंदगियां बचाईं।

खो दिया खुद का परिवार
हजारों लोगों की जान बचाने वाले गुलाम का अपना परिवार भी शहर में इस जहरीली गैस की चपेट में था पर वह अनगिनत अजनबी ज़रुरतमंदों की मदद में लगे थे। इस दुर्घटना में उन्होंने अपने बड़े बेटे को खो दिया और उनके छोटे बेटे को जिंदगीभर के लिए खतरनाक त्वचा रोग हो गया। इस दुर्घटना के बाद ग़ुलाम को भी अपनी सारी ज़िन्दगी अस्पताल के चक्कर में काटने पड़े क्योंकि बहुत ज़्यादा समय तक गैस में रहने की वजह से उनका गला जैसे पूरा जल ही गया था।
2003 में गंभीर बीमारी से गई जान
जहरीली गैस की वजह से गुलाम दस्तगीर बीमार रहने लगे थे। हादसे के चार साल बाद यानी 1988 में रिटायमेंट ले लिया था। उनका ज्यादातर समय अस्पतालों के चक्कर काटते ही बीता। बता दें कि साल 2003 में भोपाल गैस त्रासदी के हीरो गुलाम दस्तगीर की MIC की वजह से हुई गंभीर बीमारियों ने जान ले ली।
रियल हीरो बना गुमनामी का शिकार
भोपाल स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर एक पर उन सभी की याद में एक मेमोरियल बनाया गया है जिन्होंने उस दिन अपनी ड्यूटी निभाते हुए अपनी जान गंवा दी थी। लेकिन इस मेमोरियल में ग़ुलाम दस्तगीर का नाम नहीं है, जिनकी मौत बाद में हुई।
क्या हुआ था उस रात
गौरतलब है कि 2 दिसंबर 1984 को भोपाल की यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री से Methyl Isocyanate (MIC) नामक जहरीली गैस लीक हो गई थी। हवा में फैले इस जहर ने हजारों लोगों की जिंदगी निगल ली और लाखों लोग गंभीर रुप से प्रभावित हुए।



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