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कौन थे कर्पूरी ठाकुर जिन्हें मिलेगा मरणोपरांत 'भारत रत्न'? जानें बिहार के पूर्व CM की काहानी
Bharat Ratna to karpoori thakur: बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर को मरणोपरांत भारत रत्न से नवाजा जाएगा। राष्ट्रपति की ओर से जारी बयान में उन्हें भारत रत्न देने का ऐलान किया गया है। उन्हें काफी समय से भारत रत्न देने की मांग की जा रही थी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक पोस्ट के जरिए कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देने पर खुशी जताई है। बिहार में जननायक के रूप में उभरे कर्पूरी ठाकुर का जन्म 1924 में हुआ था। वह बिहार के पहले गैर कांग्रेसी मुख्यमंत्री थे। कर्पूरी ठाकुर राज्य में दो बार मुख्यमंत्री और एक बार उप मुख्यमंत्री रहे।

1952 में बने पहली बार विधायक
1952 में हुए पहली विधानसभा के चुनाव में जीतकर कर्पूरी ठाकुर पहली बार विधायक बने और आजीवन विधानसभा के सदस्य रहे. 1967 में जब पहली बार देश के नौ राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकारों का गठन हुआ तो बिहार की महामाया प्रसाद सरकार में वे शिक्षा मंत्री और उपमुख्यमंत्री बने।
1977 में पहली बार बने थे मुख्यमंत्री
कर्पूरी ठाकुर का संसदीय जीवन सत्ता से ओत-प्रोत कम ही रहा। उन्होंने अधिकांश समय तक विपक्ष की राजनीति की। बावजूद उनकी जड़ें जनता-जनार्दन के बीच गहरी थीं। उन्होंने 1977 में पहली बार मुख्यमंत्री का पद संभाला था।
कर्पूरी ठाकुर ने सामाजिक भेदभाव और असमानता के खिलाफ जीवन भर संघर्ष किया और बिहार की राजनीति में गरीबों और दबे-कुचले वर्ग की आवाज बनकर उभरे थे।
इन फैसलों की वजह से वो जननायक बनें
- देश में पहली बार OBC आरक्षण दिया था।
- 1977 में मुख्यमंत्री बनने के बाद मुंगेरीलाल कमीशन लागू किया। इसके कारण पिछड़ों को नौकरियों में आरक्षण मिला।
देश के पहले मुख्यमंत्री जिन्होंने अपने राज्य में मैट्रिक तक पढ़ाई मुफ्त की थी।
बिहार में उर्दू को दूसरी राजकीय भाषा का दर्जा दिया था।
1967 में पहली बार उपमुख्यमंत्री बनने पर अंग्रेजी की अनिवार्यता खत्म की थी।
गैर लाभकारी जमीन पर मालगुजारी टैक्स को बंद किया था।
मुख्यमंत्री बनते ही उन्होंने फोर्थक्लास वर्कर पर लिफ्ट का यूजन करने पर रोक हटाई।
आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णों और महिलाओं के लिए आरक्षण शुरु किया।
1940 में सिर्फ पांच लोग मैट्रिक पास हुए उनमें कर्पूरी भी थे
समस्तीपुर के पितौंझिया (अब कर्पूरी ग्राम) में 1904 में सिर्फ एक व्यक्ति मैट्रिक पास था। 1934 में 2 और 1940 में 5 लोग मैट्रिक पास हुए थे। इनमें एक कर्पूरी ठाकुर थे। वे ऑस्ट्रिया जाने वाले डेलीगेशन में चुने गए। उनके पास कोट नहीं था। एक दोस्त से मांगा। कोट फटा था। कर्पूरी जी वही कोट पहनकर चले गए। वहां युगोस्लाविया के मार्शल टीटो ने देखा कि उनका कोट फटा है। उन्हें नया कोट गिफ्ट किया।



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