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Exclusive on Independence Day: आधी अधूरी है अभी आज़ादी, जानें क्या कहती है आधी आबादी?
78th India's Independence Day Exclusive: जब देश को आजादी के जश्न में सराबोर होना चाहिए, गर्व से तिरंगा फहराना चाहिए और आजादी के लिए रक्त और प्राण न्योछावर करने वाले पूर्वजों को सम्मान देना चाहिए, उस वक़्त देश की बेटियां डबडबाई आँखों के साथ सरकार से इन्साफ मांग रही हैं, अपने ही मुल्क में बिना डरे जीने का माहौल मांग रही हैं। ये जानते हुए भी ऐसी मांगे कितनी बार मांगी गयी और हर बार खानापूर्ति करने के अलावा समाज और सरकार से कुछ ठोस नहीं मिलता।
पश्चिम बंगाल में महिला डॉक्टर के साथ हुई दरिंदगी के खिलाफ चारों तरफ प्रदर्शन होने शुरू हो चुके हैं लेकिन गौर कीजियेगा कि ये सब तब हो रहा है जब हम आजादी का अमृत महोत्सव मना रहे हैं और कुछ समय पहले ही चंद्रयान की सफलता में महिला शक्ति के योगदान पर फूले नहीं समा रहे थे। ऐसे में सवाल तो उठता है कि क्या इस देश की महिलाओं को या ये कहें कि देश की आधी आबादी को सच में आजादी मिल पायी है?
कुछ वर्षों पूर्व निर्भया के साथ जो घिनौना अपराध हुआ था उस वक़्त समाज और सरकार दोनों ने ये आश्वासन दिया था कि अब इस तरह की घटना नहीं होगी किन्तु कोलकाता के अस्पताल में महिला डॉक्टर के साथ जो अमानवीय पशुता हुई वो निर्भया की पुनरावृति नहीं तो और क्या है? तभी तो इसे निर्भया - 2 का नाम दिया गया है।
अब तो ऐसा लगता है कि महिलाएं अब लड़ लड़कर और अपने लिए आजादी की मांग कर करके थक गयी हैं और अपने साथ होने वाले अत्याचारों के साथ एडजस्ट करके जीना भी सिख लिया है। कभी कोई मुँह पर तेज़ाब फेंक जाता है तो कभी भीड़ में अकेली पाकर उस पर हमला कर दिया जाता है, कोई हवसी मानसिकता वाला छुप छुप कर एम्एम्एस बना के ब्लैकमेल करता है तो कितनों के परिवार आज भी घर में लेट से आने पर चरित्र पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं?
ऐसे में महिलाओं के मन में कहीं न कहीं ये सवाल तो रहता ही है कि क्या हमें पूरी आजादी मिली है? आज डिजिटल युग में जी रहे हैं, दुनिया ने काफी तरक्की कर ली है फिर भी महिलाओं के संबंध में सवाल वही जस का तस है। हमने बात की कई महिलाओं से और यही सवाल पूछा। पढ़िए उनके दिलचस्प जवाब।
प्रियंका राउत, बीएड, पोस्ट ग्रेजुएट

मेरे लिए आज़ादी का मतलब है सभी प्रकार के बंधनों से मुक्ति। मैं अपनी जिंदगी अपने अनुसार जी सकूं जिसमें न कोई पारिवारिक बंधन हो न ही कोई सामाजिक.. जहां मुझे कोई स्त्री होने के दायरे न सिखाए... मेरे लिए आज़ादी के मायने हैं... अपनी पसंद के हिसाब से जीना, अपनी पसंद के कपड़े पहनना, अपनी पसंद का खाना, जिससे भी बात करना हो या जहाँ भी मेरा मन हो वहां जाना। राजनीतिक मुद्दों पर खुलकर बात करना अपना तर्क रखना... बेखौफ ट्विटर पर अपनी राय पोस्ट करना, सही को सही और गलत बोलना मेरे लिए आजादी है और यही आज़ादी मुझे तनाव मुक्त रहने और इस दुनिया में जीने वाले हर पल का आनंद लेने की अनुमति देगी। लेकिन आजादी मिलने के इतने वर्षों के बाद भी महिलाएं आज भी उन्हीं चीजों के लिए लड़ रही हैं जिसके लिए वो सदियों पहले लड़ती थी। ट्विटर तो आ गया लेकिन हम खुलकर अपने विचार नहीं रख सकते वरना ट्रोल और मीम के शिकार हो जायेंगे। पोलिटिकल साइंस पढ़ सकते हैं लेकिन पोलिटिकल मुद्दों पर खुल कर अपनी राय नहीं दे सकते हैं। नौकरी कर सकते हैं लेकिन सुरक्षा नहीं मिलती है। कोलकाता में डॉक्टर के साथ जो हुआ वो जीता जागता उदाहरण है! सच्ची आजादी अभी भी नहीं मिली है और मुझे लगता है इसमें अभी काफी टाइम लगेगा। तब तक अपनी 'मर्यादा' में रहना ही हमारी नियति है और आजादी है।
अंजलि चौहान, पीएचडी स्कॉलर, दिल्ली विश्वविद्यालय

आजादी!!! वो क्या है? सच बोलू तो मैंने कभी इसका अनुभव किया ही नहीं। प्रतिबंधों को संस्कार का नाम देकर महिलाओं को गुलाम बना दिया जाता है। जितने आज्ञाकारी उतने ज्यादा संस्कारी। हर काम के लिए, खाने पीने के लिए, ड्रेस के लिए, मित्रता करने के लिए, यहां तक की अपने विचारो को व्यक्त करने से पहले तक डरती हूँ कोई बुरा ना मान जाए। अपनी हदों में रहना हमारी नियति है और सबसे हास्यास्पद बात ये कि इसे हमारे संस्कारों से जोड़ दिया गया है। मैंने इसे कभी नहीं जिया। मैंने इसे इसके अभाव से जाना है। जब भी मैं खुद को खाली सड़क पर या किसी सुनसान जगह पर अकेला पाती हूं, तो मुझे लगता है कि ऐसा महसूस न करना ही आजादी होगी। हर बार जब मुझे यात्रा करते समय अपना गूगल मैप ऑन रखना पड़ता है या पेपर स्प्रे तैयार रखना पड़ता है क्योंकि एक आदमी मेरे पीछे चल रहा है, तो मुझे लगता है कि ऐसा महसूस न करना ही आजादी होगी। हर बार मुझे एक अवसर छोड़ना पड़ता है क्योंकि मेरे पिता नहीं सोचते कि यह मेरे लिए सुरक्षित है, मुझे लगता है कि ऐसा न करना ही स्वतंत्रता होगी। हर बार जब मैं अपने आस-पास महिलाओं को पीड़ित देखकर रोती हूं तो मुझे लगता है कि ऐसा न महसूस करना ही आजादी होगी। मेरे लिए आज़ादी का मतलब सुकून भरी नींद है। आज़ादी मेरे लिए एक चाहत बन गई है और इसके लिए मुझे लड़ना पसंद है लेकिन मुझे लड़ने के लिए भी परमिसशन लेनी पड़ेगी। ऐसे में मै कैसे कहूं की मैं आजाद हूं।
प्रतिभा, टीचर, प्रेजेंटेशन कॉन्वेंट स्कूल

जब हम आजादी की बात करते हैं तो मुझे लगता है हम सही अर्थों में आजादी की परिभाषा भी नहीं जानते हैं। आजादी का मतलब सिर्फ कानून संविधान और सरकार से सम्बंधित नहीं है। आजादी की शुरुआत परिवार से होती है जहां हम जन्म लेते हैं। समाज पहले तो लड़का लड़की में भेद करता है। आजादी का दमन तो यहीं से शुरू हो जाता है। ये लड़कों का काम है और वो लड़कियों का काम है। ऐसी सोच वाले समाज में हम जीते हैं। बेटी के जन्म होने पर दुःख और बेटा होने पर खुश, ऐसी सोच वाला समाज है हमारा। कभी पिता के कमांड में रहो फिर भाई के फिर पति के और फिर बेटे की। स्त्री हमेशा किसी ना किसी के ऊपर निर्भर ही रहती है। ये निर्भरता जब खत्म होगी आजादी उसी वक़्त मिल जायेगी। समाज को ये बात समझना बहुत जरुरी है कि स्त्री की बनावट प्राकृतिक रूप से पुरुषो की अपेक्षा कमजोर रही है लेकिन यह स्त्री की शक्ति नहीं है। स्त्री की बुद्धिमता, उसकी करुणा, कर्तव्यपरायणता और लगनशीलता उसकी शक्ति है जिसके बिना सही अर्थों में समाज की तरक्की संभव नहीं। समाज जब इसको समझने लगेगा, स्त्री को आजादी मिलने लगेगी।
सुमन साहू, पीएचडी स्कॉलर, दिल्ली विश्वविद्यालय

हम आजाद हो गयी हैं? बिलकुल नहीं। जो कहते हैं कि हमें आजादी मिल गयी है काश वो कुछ दिनों के लिए एक महिला की जिंदगी जी कर देखते! हमारे लिए तो आज़ादी अभी भी एक अधूरा सपना ही है और शायद देश में महिलाओं की एक बड़ी आबादी ऐसा ही सोचती हैं। लड़कियों के लिए आज़ादी हमेशा शर्तों के साथ आती है। घर से बाहर जाने की आज़ादी वापस जल्दी आने की शर्त पर मिलती है, कॉलेज में दाखिला लेने की आज़ादी गर्ल्स कॉलेज या सिर्फ लड़कियों से ही दोस्ती करने की शर्त के साथ मिलती है। बिहार, कोलकाता, मुंबई में हुई हाल ही की घटनाएं ये दर्शाती हैं कि इस समाज में एक कामकाजी महिला अपनी जॉब करने के लिए और एक छोटी सी बच्ची कहीं सुरक्षित खेलने जाने के लिए भी आजाद नहीं है। महिलाओं ने हर क्षेत्र में अपनी काबिलियत का प्रदर्शन किया है, और हर मौकों पर खरा उतरी हैं। लेकिन अगर देश के 78वीं आज़ादी वर्ष में भी देश की आधी आबादी को हर रोज़ अपने कमोबेश हर काम से पहले दस बार सोचना पड़े, किसी की परमिशन लेनी पड़े तो मैं मानती हूं कि अभी महिलाएं सही मायनों में आज़ाद कहलाने से कोसों दूर हैं। जिस दिन मैं बिना किसी डर के मैट्रो व बस का सफर कर पाऊंगी, बिना हैरेसमेंट के डर के सोशल मीडिया पर अपने विचार लिख पाऊंगी और रात में अपने ही घर की छत पर खुले आसमान की खूबसूरती को निहार पाऊंगी, उस एक दिन शायद में खुद को आज़ाद कह पाऊं। लेकिन ऐसा सच में हो पायेगा? क्या पितृसत्तात्मक समाज ऐसी आजादी हमें दे पायेगा? ये हम महिलाओं को ही लड़ के लेना होगा।



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