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गणेश चतुर्थी के दिन कश्मीरी पंडित मानते हैं Pann Poshte, कुल देवी की पूजा से जुड़ी है परंपरा
आज देशभर में गणेश चतुर्थी की धूम मची हुई है। देश के कई हिस्सों में आज के दिन बप्पा का स्वागत किया जाता है, ठीक इसी दिन कश्मीरी पंडित समुदाय अपनी एक खास और अनूठी परंपरा "पन पूजा" या Pann Poshte मनाता है। यह त्योहार कश्मीर की मिट्टी से जुड़ी हजारों साल पुरानी कृषि परंपरा और आध्यात्मिकता का अद्भुत संगम है, जो आज भी दुनियाभर में बसे कश्मीरी पंडित परिवारों में उतने ही उत्साह से मनाया जाता है।

विभा और गर्भा की पूजा
कश्मीरी भाषा में "पन" का अर्थ होता है धागा (thread)। यह पर्व मूल रूप से नई कपास से काते गए धागे और दो कृषि देवियों विभा और गर्भा की पूजा से जुड़ा है। दिलचस्प बात यह है कि कश्मीर की जलवायु कपास उगाने के अनुकूल नहीं मानी जाती, फिर भी कुछ प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में यह उल्लेख मिलता है कि कभी कश्मीर में कपास की खेती होती थी। इसी काते गए धागे को कश्मीरी में "पन" कहा जाता था, और यही नाम इस पूरे पर्व का आधार बन गया।
यह पर्व भाद्रपद माह की शुक्ल पक्ष चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है, जो पूरे देश में गणेश चतुर्थी (विनायक त्सोरम) के रूप में मनाई जाती है। इसी दिन कश्मीरी पंडित परिवार अपनी कुल देवी, जिन्हें स्थानीय भाषा में "बीब गरब माएज" (माएज यानी माँ) कहा जाता है, और भगवान गणेश दोनों की पूजा एक साथ करते हैं।
पूजा की विधि और परंपरा
पन पूजा के दिन घर का पुजारी या परिवार का कोई सदस्य जल के कलश के चारों ओर कच्चे धागे को बांधता है। इसके बाद कलश में चंदन या सिंदूर से पवित्र किए गए जल की कुछ बूंदें डाली जाती हैं और देवी-देवताओं को पुष्प अर्पित किए जाते हैं। पूजा की शुरुआत प्राण-प्रतिष्ठा मंत्र से होती है, इसके बाद भगवान गणेश और देवी लक्ष्मी को समर्पित विशेष गायत्री मंत्रों का उच्चारण किया जाता है। पूजा में आसन बिछाना, देवताओं का आवाहन करना, अर्घ्य देना और स्नान कराने जैसी पारंपरिक विधियां भी शामिल होती हैं।
रोठ प्रसाद: पर्व की सबसे खास पहचान
पन पूजा की सबसे मीठी और सबसे पहचानी जाने वाली परंपरा है "रोठ" देसी घी में बनी एक मीठी ब्रेड जैसी मिठाई, जिसे पहले देवी-देवताओं को अर्पित किया जाता है और फिर परिवार तथा मित्रों में प्रसाद के रूप में बांटा जाता है। इस दिन हर कश्मीरी पंडित घर से देसी घी, ताज़े फूलों और रोठ की खुशबू आती है।इस परंपरा में एक बेहद दिलचस्प नियम भी जुड़ा है, हर साल एक निश्चित परिवार को उतने ही रोठ भेजने की परंपरा निभाई जाती है, और यह सिलसिला हर साल बिना नागा किए दोहराया जाता है। ऐसा माना जाता है कि यह परंपरा घर में समृद्धि, शुभता और आपसी रिश्तों की मजबूती बनाए रखती है।
तांत्रिक परंपरा से जुड़ाव
पन पोश्ट सिर्फ एक कृषि पर्व नहीं, बल्कि कश्मीरी पंडितों की तांत्रिक परंपरा से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। इस दिन देवी को तंत्र और मंत्र विधि से पूजा जाता है, जो कश्मीर शैव परंपरा की एक झलक दिखाता है। कुछ विद्वानों का मानना है कि पन पूजा की कथा और सत्यनारायण कथा में कई समानताएं हैं, जो दर्शाती हैं कि समय के साथ अलग-अलग पूजा-परंपराएं आपस में घुल-मिल गईं।
विस्थापन के बाद भी जीवित परंपरा
1990 के दशक में कश्मीरी पंडितों के अपनी मातृभूमि से विस्थापन के बाद उनकी कई परंपराएं कमजोर पड़ गईं, लेकिन Pann Poshte जैसे पर्व आज भी दिल्ली, जम्मू और दुनिया के अलग-अलग कोनों में बसे कश्मीरी पंडित परिवारों में पूरी श्रद्धा से मनाए जाते हैं। यह पर्व अब सिर्फ पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं, बल्कि समुदाय को अपनी जड़ों से जोड़े रखने का एक भावनात्मक माध्यम बन चुका है।
Pann Poshte कश्मीरी पंडितों की उस समृद्ध सांस्कृतिक विरासत की मिसाल है, जहां कृषि, आस्था और तंत्र-परंपरा एक साथ मिलकर एक जीवंत उत्सव का रूप लेती हैं। गणेश चतुर्थी के दिन जब पूरा देश गणपति बप्पा की भक्ति में डूबा होता है, ठीक उसी दिन कश्मीरी पंडित परिवार रोठ की खुशबू और "पन पूजा सारेनी" की शुभकामनाओं के साथ अपनी इस अनूठी परंपरा को जीवित रखते हैं।



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