Latest Updates
-
छोटी हाइट वाली लड़कियों पर सबसे ज्यादा जंचते हैं ये आउटफिट, दिखती हैं सुपर स्टाइलिश और लंबी -
बरसात में इन 5 लोगों को गलती से भी नहीं खाना चाहिए दही, वरना बिगड़ सकती है सेहत -
Ravi Pradosh Vrat Katha: इस कथा के बिना अधूरा है रवि प्रदोष व्रत, जानें पूजा विधि, शुभ मुहूर्त और शिव आरती -
World Paper Bag Day 2026: कब और क्यों हुई पेपर बैग दिवस की शुरुआत? जानें इसका दिलचस्प इतिहास -
गलती से भी पास-पास न रखें मनी प्लांट और तुलसी का पौधा, वरना कंगाली के साथ आ जाएंगी ये 3 बड़ी मुसीबतें -
इस एक श्राप की वजह से अविवाहित कपल्स नहीं कर सकते जगन्नाथ मंदिर में दर्शन, आप भी जान लें रहस्य -
Varalakshmi Vrat के दिन लगेगा साल का आखिरी चंद्र ग्रहण, जानें क्या करें, क्या न करें और सूतक के नियम -
क्या 1876 जैसी तबाही फिर होगी? 150 साल बाद लौट सकता है विनाशकारी अल नीनो! सूखा और अकाल का खतरा -
बरसात में भूलकर भी न खाएं ये 10 सब्जियां, वरना शरीर बन सकता है बीमारियों का घर -
अनचाहे गर्भ से बचने के लिए कौन-सा तरीका है सबसे सुरक्षित? एक्सपर्ट से जानें पूरी जानकारी
Khanjar Vivah: हिमाचल की अनोखी शादी की रस्म, जहां दुल्हन दूल्हे की जगह खंजर संग लेती हैं फेरे!
Khanjar Vivah Himachal : भारत विविधताओं की भूमि है। यहाँ हर राज्य, हर समुदाय और हर क्षेत्र की अपनी-अपनी परंपराएँ और रीति-रिवाज देखने को मिलते हैं। यही विविधता भारत की सांस्कृतिक पहचान को और भी समृद्ध बनाती है। दिलचस्प बात यह है कि एक ही धर्म या जाति के अंदर भी परंपराओं में क्षेत्रीय भिन्नता देखने को मिलती है।
कहीं भव्य शादियों की धूम रहती है तो कहीं विवाह रस्में बेहद सादगी और अनोखे तरीके से निभाई जाती हैं। ऐसी ही एक अनूठी परंपरा हिमाचल प्रदेश में आज भी देखने को मिलती है, जिसे 'खंजर विवाह' या 'छुरा विवाह' कहा जाता है।

क्या है खंजर विवाह?
हिमाचल प्रदेश के कुल्लू, किन्नौर और शिमला के कुछ इलाकों में प्रचलित इस परंपरा को इसलिए अनोखा माना जाता है क्योंकि इसमें दूल्हा स्वयं शादी में शामिल नहीं होता। उसकी जगह दूल्हे का खंजर (छुरा) बारात के साथ दुल्हन के घर पहुँचता है। यही खंजर शादी में दूल्हे की उपस्थिति का प्रतीक माना जाता है और विवाह की सभी प्रमुख रस्में इसी के साथ संपन्न की जाती हैं।
दूल्हे की जगह क्यों भेजा जाता है खंजर?
पारंपरिक भारतीय विवाहों में जहाँ बारात, नाच-गाना और भारी भीड़-भाड़ होती है, वहीं खंजर विवाह बेहद सादा होता है। दूल्हे की ओर से केवल 5, 7 या 11 लोगों का छोटा-सा समूह दुल्हन के घर जाता है। इस समूह का नेतृत्व दूल्हे का बड़ा भाई या कोई नजदीकी रिश्तेदार करता है, जो खंजर अपने हाथ में लिए होता है। यह खंजर केवल प्रतीक नहीं बल्कि विवाह में दूल्हे की आत्मिक उपस्थिति का प्रतिनिधित्व करता है।
रस्में होती हैं खंजर के साथ
शादी की सभी रस्में - हल्दी, मेहंदी, पूजन और यहाँ तक कि फेरे तक - खंजर के साथ ही पूरे किए जाते हैं। दुल्हन खंजर के पास बैठती है और उसी को अपने भावी पति का प्रतीक मानकर पूजती है। जब विवाह की रस्में पूरी हो जाती हैं, तो दुल्हन उसी खंजर के साथ दूल्हे के घर विदा होती है। पहली बार दुल्हन अपने पति से उसके घर पर ही मिलती है। वहाँ जाकर अंतिम रस्में पूरी होती हैं और दूल्हा दुल्हन की मांग में सिंदूर भरता है।
इस शादी के पीछे की पारपांरिक वजह
इतिहासकारों और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार इस परंपरा की शुरुआत व्यावहारिक कारणों से हुई थी। हिमाचल के दुर्गम पहाड़ी इलाकों में बड़े स्तर पर बारात ले जाना कठिन और महंगा होता था। दुल्हन के परिवार पर इतना आर्थिक बोझ उठाना मुश्किल था। इसलिए खंजर विवाह की शुरुआत हुई ताकि विवाह भी संपन्न हो सके और अनावश्यक दिखावे पर खर्च भी न हो।
दूसरा कारण सुरक्षा भी माना जाता है। पुराने समय में पहाड़ों की यात्रा जोखिम भरी होती थी। ऐसे में दूल्हे की जान को खतरे से बचाने के लिए उसकी जगह खंजर भेजने की प्रथा विकसित हुई। वहीं कुछ मान्यताओं के अनुसार, दूल्हे का स्वयं दुल्हन के घर जाना उसकी गरिमा के खिलाफ माना जाता था।
खंजर का शादी में महत्व
स्थानीय लोगों के लिए यह खंजर सिर्फ एक धातु का टुकड़ा नहीं है। माना जाता है कि इसमें दूल्हे की आत्मा और उसकी शक्ति समाहित होती है। यह खंजर दुल्हन का रक्षक है, जो उसे नए घर जाते समय बुरी शक्तियों और नकारात्मकता से बचाता है। यह सुरक्षा, निष्ठा और आध्यात्मिक जुड़ाव का प्रतीक माना जाता है।



Click it and Unblock the Notifications