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Holi 2025 : भारत के इन गांवों में आज भी नहीं जलाई जाती है होली, वजह भी है चौंकान्ने वाली
Holika Dahan Restricted Places in india : होली से एक दिन पहले होने वाला होलिका दहन बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि इसी दिन भक्त प्रह्लाद की बुआ होलिका ने उसे अग्नि में जलाने का प्रयास किया था, लेकिन स्वयं जलकर भस्म हो गईं।
तभी से फाल्गुन मास की पूर्णिमा को होलिका दहन की परंपरा चली आ रही है। हालांकि, भारत में कुछ स्थान ऐसे भी हैं जहां धार्मिक आस्थाओं और परंपराओं के कारण यह अनुष्ठान नहीं किया जाता। आइए जानते हैं ऐसे ही कुछ स्थानों के बारे में।

मध्यप्रदेश का हथखोह गांव
मध्यप्रदेश के सागर जिले में स्थित हथखोह गांव में पिछले 400 वर्षों से होलिका दहन नहीं किया गया है। स्थानीय निवासियों के अनुसार, यहां घने जंगल में झारखंडन माता का प्राचीन मंदिर स्थित है। मान्यता है कि माता स्वयं यहां प्रकट हुई थीं और उनकी एक छोटी प्रतिमा स्थापित की गई थी। वर्षों पहले जब गांव में होलिका दहन किया गया था, तब भीषण आग लग गई, जिसने पूरे क्षेत्र को चपेट में ले लिया। इसे देवी का प्रकोप मानते हुए गांववासियों ने मंदिर में क्षमा याचना की और यह संकल्प लिया कि वे अब कभी भी होलिका दहन नहीं करेंगे। तब से आज तक, इस गांव में यह परंपरा कायम है।
उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले का बारसी गांव
उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के बारसी गांव में भी होलिका दहन नहीं किया जाता। यहां के लोग मानते हैं कि यदि गांव में होलिका दहन हुआ, तो भगवान शिव के चरण जल जाएंगे। इसी मान्यता के चलते इस अनुष्ठान को वर्जित माना गया है। हालांकि, गांव की महिलाएं होली से एक दिन पहले पास के टिकरोल गांव जाकर होलिका दहन करती हैं।
बारसी गांव में एक प्राचीन शिव मंदिर है, जिसे महाभारत काल का बताया जाता है। कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण कौरवों और पांडवों ने करवाया था, लेकिन भीम ने अपनी गदा से मंदिर के प्रवेशद्वार की दिशा बदल दी थी। इसके बाद से ही गांव के लोगों का विश्वास है कि यहां होलिका दहन करने से भगवान शिव के चरणों को नुकसान पहुंच सकता है।
राजस्थान के भीलवाड़ा जिले का हरणी गांव
राजस्थान के भीलवाड़ा जिले के हरणी गांव में पिछले 70 वर्षों से होलिका दहन नहीं हुआ है। इसकी वजह एक घटना को माना जाता है, जब गांव में होलिका दहन के समय अचानक आग लग गई थी। इस आग के कारण कई परिवारों में विवाद उत्पन्न हो गया, जिससे लोगों ने यह निर्णय लिया कि अब गांव में होलिका दहन नहीं किया जाएगा। तब से यहां होली का त्योहार चांदी की होली मनाकर मनाया जाता है।
छत्तीसगढ़ के गोंडपेंड्री गांव में होलिका दहन वर्जित
छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले का गोंडपेंड्री गांव भी ऐसा स्थान है जहां सदियों से होलिका दहन नहीं होता। मान्यता है कि वर्षों पहले इसी दिन गांव के एक युवक को जिंदा जलाने की कोशिश की गई थी। इस दर्दनाक घटना के बाद गांववालों ने निर्णय लिया कि यहां होलिका दहन नहीं किया जाएगा। उसी परंपरा को आज भी निभाया जा रहा है।
झांसी के एरच कस्बे में नहीं होता होलिका दहन
झांसी के पास स्थित एरच कस्बे को हिरण्यकश्यप का स्थान माना जाता है। मान्यता है कि इसी स्थान पर होलिका, प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर जलती चिता में बैठी थी। यहां होलिका को देवी के रूप में पूजा जाता है, और इसी कारण होलिका दहन की मनाही है। मान्यता अनुसार, आज भी एरच में वह अग्निकुंड मौजूद है, जिसमें होलिका की चिता जली थी।



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