Latest Updates
-
Yoga For PCOS: पीसीओएस से परेशान महिलाएं रोज करें ये 5 योगासन, हार्मोन संतुलन में मिलेगी मदद -
Hanuman Jayanti 2026: हनुमान जयंती कब है? जानें तिथि, शुभ मुहूर्त, धार्मिक महत्व और पूजा विधि -
अमेरिका में तेजी से फैल रहा कोरोना का नया 'Cicada' वेरिएंट, जानिए लक्षण, कितना खतरनाक और कैसे करें बचाव -
इस दिन झाड़ू खरीदने से घर आती हैं लक्ष्मी, जानें झाड़ू से जुड़े जरूरी वास्तु नियम -
बैड कोलेस्ट्रॉल को कंट्रोल करने में रामबाण हैं ये 5 हरे पत्ते, रोजाना सेवन से हार्ट भी रहेगा हेल्दी -
Navratri Day 9: नवरात्रि के नौवें दिन करें मां सिद्धिदात्री की पूजा, जानें पूजा विधि, मंत्र, भोग और आरती -
Navratri Day 9 Wishes: मां सिद्धिदात्री का आशीष मिले...इन संदेशों से अपनों को दें महानवमी की शुभकामनाएं -
Ram Navami 2026 Wishes Quotes: भए प्रगट कृपाला...इन चौपाइयों के साथ अपनों को दें राम नवमी की शुभकामनाएं -
Aaj Ka Rashifal 27 March 2026: जानें आज किन राशियों की चमकेगी किस्मत, किन्हें रहना होगा सावधान -
डायबिटीज की दवा मेटफॉर्मिन कैसे डालती है दिमाग पर असर, 60 साल बाद रिसर्च में हुआ खुलासा
'चिपको आंदोलन' के 45 वर्ष हुए पूरे, गूगल ने डूडल बनाकर दिया ट्रिब्यूट
आज गूगल ने डूडल बनाकर चिपको आंदोलन की 45 वीं सालगिरह के मौके पर ट्रिब्यूट दिया है। इस आंदोलन की शुरुआत वन क्षेत्र में अवैध रुप से वन कटाई को रोकने के लिए हुई थी, 1973-74 के आसपास हुई थी। यह आंदोलन अपने आप में इतना महत्वपूर्ण इसलिए भी है कि पेड़ो की अवैध कटाई रोकने के लिए जन समूह द्वारा पहली बार शांति के साथ आंदोलन चलाया गया था, जिसे रोकने के लिए सरकार को बाद में हस्तक्षेप करना पड़ा था।

बाद में आगे चलकर पर्यावरण के क्षेत्र में यह आंदोलन काफी चर्चा में रहा। इस आंदोलन की जननी गौरा देवी को बाद में चिपको वूमेन के नाम से ख्याति मिली। आइए जानते है कि क्या था चिपको आंदोलन?

यह था चिपको आंदोलन
बात 1974 की है, उत्तराखंड (तब उत्तरप्रदेश) के रैंणी गाँव के जंगल के लगभग ढाई हज़ार पेड़ों को काटने की नीलामी हुई जिसका विरोध गौरा देवी नामक महिला ने अन्य महिलाओं के साथ किया था। यहां के लोग पेड़ों को अपना परिवार का हिस्सा मानते थे। इसके बावजूद सरकार और ठेकेदार के निर्णय में बदलाव नहीं आया. जब ठेकेदार के आदमी पेड़ काटने पहुँचे तो गौरा देवी और उनके 21 साथी पेड़ों से चिपक गई और प्रशासन को कहा पहले काटो फिर इन पेड़ों को भी काटना उस समय ठेकेदारों को वापस जाना पड़ा।

प्रधानमंत्री को लगाना पड़ा प्रतिबंध
स्थानीय महिलाओं की अगुआई में शुरू हुए इस आंदोलन का प्रसार चंडी प्रसाद भट्ट और उनके एनजीओ ने किया, गांधीवादी विचारक सुंदरलाल बहुगुणा ने इस आंदोलन को दिशा दी। ये आंदोलन उस वक्त कितना चरम पर रहा होगा इस बात का अंदाजा आप इससे ही लगा सकते हैं कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने बाद में इस बात की गम्भीरता को समझते हुए हिमालयी क्षेत्र पर वनों की कटाई पर 15 साल का प्रतिबंध लगाते हुए, एक विधेयक पारित किया था। उत्तर प्रदेश की सफलता के बाद यह आंदोलन देश के अन्य हिस्सों में फैल गया।

राजस्थान का खेजड़ली आंदोलन
चिपको आंदोलन की प्रेरणा 18वीं सदी में राजस्थान में हुए पेड़ बचाने के 'खेजड़ली आंदोलन' से ली गई थी। उस दौर में जोधपुर के महाराजा ने खेजड़ी के पेड़ों को काटने का आदेश दिया था। उसके खिलाफ बिश्नोई समुदाय के लोग पेड़ों से चिपककर उनको काटने से बचाते थे। इसके तहत अमृता देवी के नेतृत्व में 84 गांवों के 383 लोगों ने खेजड़ी पेड़ों को बचाने के लिए अपने प्राणों का बलिदान किया। जिसका परिणाम ये हुआ कि उस समय के जन आक्रोश को देखते हुए जोधपुर के महाराजा को बिश्नोई समुदाय से जुड़े गांवों में पेड़ों की कटाई पर बैन लगा दिया गया और आज भी इन गांवों के पेड़ों के कटाई पर बैन लगा हुआ है।

नारीवादी पर्यावरण
इस आंदोलन के बाद चिपको आंदोलन की जननी और प्रणेता गौरा देवी, जो विश्व में चिपको वूमन के नाम से मशहूर हो गई। वन संरक्षण के इस अनूठे आंदोलन ने न सिर्फ देश भर में पर्यावरण के प्रति एक नई जागरूकता पैदा की बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 'नारीवादी पर्यावरणवाद' शब्द का जन्म हुआ। आज देश विदेशों में पर्यावरण के बारे में जब भी चर्चा होती है तो चिपको आंदोलन को एक मिसाल बनाकर पेश किया जाता है।



Click it and Unblock the Notifications











