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गांधी ने नहीं इस क्रांतिकारी ने दिया था 'भारत छोड़ो' और 'साइमन गो बैक' का नारा
भारत आजादी की 82 वीं वर्षगांठ मनाने वाला है। आजादी को हासिल करने में कई चेहरे जाने-पहचाने थे तो कुछ ऐसे भी थे जिनका नाम हम लोगों ने शायद ही कभी सुना होगा। इन्हीं में से एक नाम है यूसुफ मेहराली का। बहुत कम लोग जानते हैं कि यूसुफ ने आजादी का सबसे कारगर नारा भारत छोड़ो दिया था। बाद में इसी नारे को महात्मा गांधी ने 1942 में भारत की आजादी के लिए छेड़े गए सबसे बड़े आंदोलन के लिए अपनाया था। उन्होंने ही पहली बार साइमन गो बैक का नारा दिया था।
कहा जाता है कि वे गांधीजी के काफी करीब थे और उन्होंने इस मूवमेंट को आरंभ करने से कुछ समय पूर्व ही गांधीजी से मुलाकात कर उन्हें इस स्लोगन का सुझाव दिया था। उस समय यूसुफ बांबे के मेयर थे। स्वतंत्रता संग्राम में वे 8 बार जेल गए थे।

शुरु से था देशभक्ति का जज्बा
यूसुफ कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के संस्थापक सदस्य थे। यूसुफ मेहराली का जन्म मुंबई के एक संपन्न मुस्लिम बोहरा परिवार में 23 सितम्बर, 1903 को हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा बोरीबंदर के न्यू हाईस्कूल में हुई। इसके बाद सेंट जेवियर कालेज और एल्फिंस्टन कालेज उनकी पढ़ाई का केंद्र बना। इसी दौरान उनके अंदर नाटकों और कविताएं लिखने का जुनून सवार हुआ। धीरे-धीरे उनकी दिलचस्पी राजनीतिक गतिविधियों में बढ़ने लगी। इसके चलते ही वह बॉम्बे स्टूडेंट ब्रदर हुड संगठन में शामिल हुए जिसने 20 मई, 1928 को बंबई के ओपेरा हाउस में एक सभा का आयोजन किया। इस सभा को पंडित जवाहर लाल नेहरू और नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने भी संबोधित किया था। इन दोनों के भाषणों से प्रभावित होकर वे तत्कालीन राष्ट्रभक्त युवाओं की संस्था यूथ लीग के सदस्य बन गए।

दिया साइमन गो बैक का नारा
कॉलेज में फीस वृद्धि और बेंगलौर में छात्रों पर पुलिस की गोलीबारी के विरोध तथा हड़ताली मिल मजदूरों के समर्थन में जनसभाएं आयोजित कर यूसुफ ने अपनी संगठन क्षमता का परिचय दिया। उनकी क्षमताओं से घबराई ब्रिटिश हुकूमत ने उन्हें बॉम्बे हाईकोर्ट में प्रैक्टिस करने तक से रोक दिया। जब भारत को कुछ अधिकार दिए जाने की बात सामने आई तो उसके लिए साइमन की अध्यक्षता में एक आयोग बनाया गया। यूसुफ इस आयोग के एकमात्र भारतीय सदस्य थे। दिसंबर 1927 को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने साइमन कमीशन के बहिष्कार का प्रस्ताव पारित किया। 3 फरवरी, 1928 की रात में बंबई के मोल बंदरगाह पर पानी के जहाज से साइमन कमीशन के सदस्य उतरे। तभी समाजवादी नौजवान यूसुफ मेहर अली ने नारा लगाया साइमन गो बैक का नारा दिया। इसके बाद ब्रिटिश हुकूमत ने प्रदर्शनकारियों पर जमकर लाठी बरसाईं।

इस किताब में भी किया है दावा
के गोपालास्वामी ने अपनी किताब 'गांधी एंड बॉंबे' में लिखा है कि QUIT INDIA को यूसुफ ने ही गांधीजी के सामने पेश किया था और गांधीजी ने उसे स्वीकार था। यूसुफ के बायोग्राफर मधू दंडवते के अनुसार, यूसुफ ने QUIT INDIA नाम से एक बुकलेट पब्लिश की थी। ये बुकलेट 1942 मूवमेंट की शाम को लाई गई थी। उक्त फोटो उनकी ही किताब से ली गई है। उन्होंने अपनी किताब में लिखा था, "Shantikumar Morarji has recorded that Gandhi conferred with his colleagues in Bombay on the best slogan for independence - when this was is not stated. One of them suggested ‘Get out'. Gandhi rejected it as being impolite. Rajagopalachari mentioned ‘Retreat' or ‘Withdraw'. That too did not find favour. Yusuf Meherali presented Gandhi with a bow bearing the inscription ‘Quit India'. Gandhi said in approval, ‘Amen'." यूसुफ मेहराली सेंटर के को-फाउंडर्स में से एक जीजी पारिख कहते हैं कि यूसुफ जी ने 7 अगस्त 1942 से पहले ही QUIT INDIA लिखे कई बैज प्रिंट कराए थे।

भारत छोड़ों का प्रस्ताव
8 अगस्त, 1942 को भारत छोड़ों का प्रस्ताव पारित हुआ। इस अधिवेशन से घबराई ब्रिटिश हुकूमत ने 9 अगस्त, 1942 को सभी बड़े नेताओं को जेल में डाल दिया। इसके बाद शुरू हुई अगस्त क्रांति ने ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिलाकर रख दी थी। यही वो वक्त था जब यूसुफ को ब्रिटिश हुकूमत ने बंदी बनाकर अनेकानेक यातनाएं दी। लेकिन बाद में उन्हें मजबूरन रिहा करना पड़ा। 31 मार्च 1949 को वे मुम्बई नगर (दक्षिणी) निर्वाचन क्षेत्र से चुने जाने पर विधान सभा के सदस्य बने। 2 जुलाई, 1950 को उन्होंने अपने साथियों से अंतिम समय में विदा ले ली। मृत्यु के समय उनकी आयु मात्र 47 वर्ष थी। जयप्रकाश जी उनके अंतिम समय में मौजूद थे। उनकी शवयात्रा में कई बड़े नेता शामिल हुए और उनके पार्थिव शरीर को कंघा दिया था।



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