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Makar Sankranti 2026: मकर संक्रांति पर रूठी सास को कैसे और क्यों मनाती है बहू? जानिए ब्रज की अनोखी परंपरा
Makar Sankranti 2026: 14 जनवरी 2026, दिन बुधवार यानी आज को देशभर में मकर संक्रांति का त्योहार मनाया जा रहा है। अलग-अलग राज्यों में इसे अलग-अलग नामों और तरीकों से मनाया जाता है। इस त्योहार का नाम आते ही मुंह में मीठी-मीठी तिल की गजक, रेवड़ी और लड्डुओं की मिठास घुल जाती है। लेकिन ब्रज की बात करें तो यहां तो इस त्योहार को मनाने का तरीक बहुत ही अनुठा और रोचक है।
यहां पर एक ऐसी अनोखी परंपरा निभाई जाती है, जिसे सुनकर आप भी मुस्कुरा उठेंगे। दरअसल, इस दिन सास जानबूझकर रूठ जाती है और बहू उसे प्यार, सम्मान और उपहारों से मनाती है। आइए जान लेते हैं इस परपरा के बारे में विस्तार से और कैसे मनाया जाता है रूठी सासु मां को और उन्हें क्या उपहार दिया जाता है।

कैसे रूठती है सासु मां?
मकर संक्रांति के मौके पर ब्रज में एक अनोखी परंपरा निभाई जाती है जिसमें सासु मां बहुरानी से रूठ जाती हैं। फिर आती है बहु की बारी जो गुस्सा हुई सास को मनाती है और उन्हें उपहार भी देती है। इस परंपरा का मकसद सिर्फ रस्म निभाना नहीं, बल्कि सास-बहू के रिश्ते में अपनापन, समझ और प्रेम बढ़ाना है।
रूठी सासु मां को क्या दिया जाता है?
अक्सर सास-बहु के बीच अनबन होती रहती है और ये कोई बड़ी बात नहीं है। मगर मकर संक्रांति के दिन तो इस रूठने-मनाने को परंपरा का नाम दे दिया गया है। ऐसे में बहु रूठी सास को मनाने के लिए उन्हें तिल-गुड़, कपड़े, चूड़ियां या मिठाइयां देती हैं और मनुहार करती हैं। ऐसा माना जाता है कि इस मनुहार से रिश्तों में जमी दूरी की धूल साफ हो जाती है और घर में सुख, समृद्धि और सौभाग्य बना रहता है।
कैसे निभाई जाती है ये रस्म?
मकर संक्रांति के दिन ब्रज में एक अनोखा दृश्य देखने को मिलता है। इस दिन सास जानबूझकर रूठ जाती है और घर छोड़कर किसी पड़ोसन के यहां या पास के किसी सार्वजनिक स्थान पर जाकर बैठ जाती है। पहले के समय में सासें गांव के कुएं के पास या गांव से शहर जाने वाले रास्ते पर जाकर बैठती थीं। फिर बहू उन्हें मनाने के लिए जतन करती है और रूठी सास मान जाती है और वो बहू के साथ घर लौट आती है।

क्या है इस परंपरा के पीछे की कहानी
बहुत समय पहले उत्तर भारत के एक छोटे से गांव में एक संयुक्त परिवार रहता था। घर की मुखिया थीं धर्मवती देवी, जिनकी बात पूरे गांव में मानी जाती थी। उनकी बहू सीमा नई-नई शादी होकर आई थी शांत, संस्कारी और रिश्तों को दिल से निभाने वाली। एक साल मकर संक्रांति आई। सुबह से ही घर में तिल-गुड़, खिचड़ी और पकवान बन रहे थे, लेकिन अचानक सास धर्मवती देवी बिना किसी वजह के बहू से नाराज हो गईं। वे कमरे में चली गईं और खाना तक नहीं खाया। सीमा घबरा गई उसे समझ नहीं आ रहा था कि गलती क्या हुई।
तभी पड़ोस की बुजुर्ग अम्मा ने सीमा से कहा, बेटी सास का रूठना और बहू का मनाना हमारी पुरानी परंपरा है। तब सीमा मुस्कुराई। उसने जल्दी से थाली सजाई जिसमें तिल के लड्डू, गुड़, खिचड़ी, एक नई साड़ी और चूड़ियां रखीं। वह सास के पास मगई, उनके चरण छुए और बोली, मां, अगर मुझसे कोई भूल हुई हो तो माफ कर दीजिए। आज संक्रांति है, मुझे आपका आशीर्वाद चाहिए।
धर्मवती देवी की आंखें भर आईं। उन्होंने बहू को गले लगाया और कहा, बेटी, ये रूठना सिर्फ एक रस्म थी... ताकि तुम अपने प्यार और सम्मान से घर को और मजबूत करो। उस दिन पूरे घर में हंसी, मिठास और अपनापन फैल गया। गांव में यह परंपरा मशहूर हो गई कि मकर संक्रांति पर बहू जब अपनी सास को मनाती है, तो घर में सालभर सुख-शांति बनी रहती है।



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