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Guru Bhairavaikya Mandira: कर्नाटक का गुरु भैरवैक्य मंदिर क्यों है इतना खास? जिसका पीएम मोदी ने किया उद्घाटन
Guru Bhairavaikya Mandira: 15 अप्रैल 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कर्नाटक के मांड्या जिले स्थित आदिचुनचनगिरी में श्री गुरु भैरवैक्य मंदिर का उद्घाटन किया, जिसके बाद से यह मंदिर लगातार चर्चा में बना हुआ है। यह मंदिर सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि आध्यात्मिक एकता और सेवा की भावना का प्रतीक माना जा रहा है। दरअसल, यह मंदिर किसी देवी-देवता को समर्पित नहीं है, बल्कि यह श्री गुरु भैरवैक्य को समर्पित है। खास बात यह है कि यहां पारंपरिक मंदिरों की तरह मूर्ति पूजा नहीं होती, बल्कि यह स्थान उनकी शिक्षाओं, सेवा और आध्यात्मिक विरासत को समर्पित एक स्मारक के रूप में विकसित किया गया है।

कौन हैं श्री गुरु भैरवैक्य?
'भैरवैक्य' शब्द का मतलब होता है भैरव यानी भगवान शिव के स्वरूप में पूरी तरह लीन हो जाना या उनसे एकत्व प्राप्त करना। यह विचार प्राचीन शैव परंपरा से जुड़ा है, जिसमें भैरव को शिव का एक प्रमुख रूप माना जाता है। कर्नाटक का यह मंदिर भी इसी आध्यात्मिक परंपरा को दर्शाता है। यह मंदिर श्री गुरु भैरवैक्य को समर्पित है, जिन्हें लोग डॉ. बालगंगाधरनाथ स्वामीजी के नाम से जानते हैं। वे आदिचुनचनगिरी मठ के 71वें पीठाधीश्वर थे। डॉ. बालगंगाधरनाथ स्वामीजीअपने जीवन में समाज सेवा, शिक्षा और जरूरतमंदों की मदद के लिए जाने जाते थे, इसलिए इस मंदिर के जरिए उनकी याद और उनके विचारों को संजोकर रखा गया है।
डॉ. बालगंधाधरनाथ स्वामीजी का इतिहास
डॉ. बालगंगाधरनाथ महास्वामीजी का जन्म साल 18 जनवरी 1945 को कर्नाटक में हुआ था। उनका संबंध कन्नड़ वोक्कालिगा समुदाय से था, जो एक कृषि आधारित समाज माना जाता है। बचपन से ही उनका रुझान आध्यात्मिकता, सेवा और अनुशासन की ओर था। छोटी उम्र में ही वे आदिचुनचनगिरी महासंस्थान मठ से जुड़ गए, जहां उन्होंने गुरु-शिष्य परंपरा के तहत शिक्षा और साधना हासिल की। उनके नेतृत्व में मठ ने सिर्फ धार्मिक कार्यों तक ही खुद को सीमित नहीं रखा बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य और समाज सेवा के क्षेत्र में भी बड़ा काम किया। उन्होंने कई स्कूल, कॉलेज और संस्थानों की स्थापना कर लोगों के जीवन को बेहतर बनाने में अहम योगदान दिया।
श्री गुरु भैरवैक्य मंदिर की खासियत
श्री गुरु भैरवैक्य मंदिर को पारंपरिक द्रविड़ शैली में बनाया गया है, जो इसकी भव्यता और दक्षिण भारतीय वास्तुकला की खूबसूरती को दिखाता है।
इस मंदिर के निर्माण में करीब 80 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं, जिससे इसकी विशालता और कलात्मकता का अंदाजा लगाया जा सकता है।
यह मंदिर किसी देवी-देवता की मूर्ति के बजाय एक महान संत की स्मृति को समर्पित है इसलिए इसे श्रद्धांजलि स्वरूप तैयार किया गया है।
आदिचुनचनगिरी मठ को एक सिद्ध पीठ माना जाता है, जहां साधकों ने वर्षों तक तप और साधना कर आध्यात्मिक ऊंचाइयां हासिल की हैं।
दक्षिण भारत के प्रमुख आध्यात्मिक स्थलों में इसकी खास पहचान है और यह गुरु-शिष्य परंपरा का एक जीवंत उदाहरण भी माना जाता है।
फिलहाल इस मठ का संचालन श्री श्री श्री निर्मलानंदनाथ स्वामीजी कर रहे हैं, जो इसके 72वें पीठाधीश्वर हैं।



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