टू-फिंगर टेस्ट पर लगी रोक, जानें भारत में रेप को लेकर कितने सख्त हैं कानून

सुप्रीम कोर्ट ने 31 अक्टूबर 2022 को रेप के एक मामले में टू-फिंगर टेस्ट पर प्रतिबंध लगा दिया, एक ऐसा कदम जो भारत में रेप के दोषियों के हिस्टोरिकल ट्रेजेक्ट्री को बदल देगा। रेप-मर्डर के एक मामले में कनविक्शन बहाल करते हुए, जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ और जस्टिस हिमा कोहली की बेंच ने ये फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि टू-फिंगर टेस्ट एक सेक्सिस्ट मेडिकल प्रेक्टिस है जो रेप से से बचे लोगों को फिर से पीड़ित और बार-बार तकलीफ देती है। कोर्ट ने यौन हिंसा के मामलों में हेल्थ प्रोवाइडर और मिनिस्ट्री ऑफ हेल्थ एंड फैमली वेलफेयर के 2014 के दिशा-निर्देशों को लागू करने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों को निर्देश भी जारी किए। आइये जानते हैं ये टू फिंगर टेस्ट क्या है और भारत में रेप को लेकर क्या-क्या कानून बने हैं-

टू-फिंगर टेस्ट क्या है?

टू-फिंगर टेस्ट क्या है?

टू-फिंगर टेस्ट में वैजाइनल मसल्स की सैगिंग को चेक करने और हाइमन की जांच करने के लिए एक मेडिकल प्रैक्टिशनर एक महिला की योनि में दो उंगलियां डालता है।

एक महिला, जिसे यौन उत्पीड़न का शिकार बनाया गया है, का परीक्षण ये समझने के लिए किया जाता है कि क्या उन्होंने हाल ही में सेक्स किया था। हालांकि, इस प्रक्रिया को अवैज्ञानिक और रेट्रोग्रेड बताया गया है। इस तरह से चेक करने का रेप के आरोप से कोई लेना-देना नहीं है। डब्ल्यूएचओ द्वारा जारी एक बुकलेट में बताया गया है कि 'टू-फिंगर' टेस्ट के लिए कोई जगह नहीं है, इसकी कोई वैज्ञानिक वैधता नहीं है।

वर्मा समिति ने की थी टू-फिंगर टेस्ट पर प्रतिबंध लगाने की सिफारिश

2012 में निर्भया कांड के तुरंत बाद, पूर्व CJI जेएस वर्मा के नेतृत्व में गठित वर्मा समिति ने टू-फिंगर टेस्ट पर प्रतिबंध लगाने की सिफारिश की थी। इसके बाद, 2013 में, आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम, 2013 के तहत, परीक्षण को अवैध बना दिया गया था।

टू फिंगर टेस्ट को लेकर कोर्ट ने 2013 से अब तक क्या कुछ कहा-

टू फिंगर टेस्ट को लेकर कोर्ट ने 2013 से अब तक क्या कुछ कहा-

मई 2013 में, सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि टू फिंगर टेस्ट महिला के निजता के अधिकार का उल्लंघन करता है और सरकार से यौन हमले की पुष्टि के लिए बेहतर चिकित्सा प्रक्रिया प्रदान करने के लिए कहा था। जस्टिस बीएस चौहान और जस्टिस एफएमआई कलीफुल्ला की बेंच ने कहा, मेडिकल प्रोसिजर को इस तरह से नहीं किया जाना चाहिए जो क्रूर, अमानवीय या अपमानजनक ट्रीटमेंट का बनाता है और लिंग आधारित हिंसा से निपटने के दौरान स्वास्थ्य को सर्वोपरि माना जाना चाहिए।

अगस्त में,देश की टॉप मेडिकल एजुकेशन रेगुलेटरी बॉडी, नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) ने टू-फिंगर टेस्ट के बारे में दिशानिर्देशों सहित फोरेंसिक दवा के मॉड्यूल में संशोधन किया। रेगुलेटरी बॉडी ने कहा कि अगर आदेश दिया जाता है तो इन परीक्षणों के अवैज्ञानिक आधार के बारे में अदालत को समझाने के लिए छात्रों को अवगत कराया जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट ने सेंट्रल और स्टेट ववर्मेंट को ये सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि 2014 के दिशानिर्देश सभी अस्पतालों में बताया जाए, हेल्थ प्रोवाइडर्स के लिए प्रशिक्षण कार्यशालाएं आयोजित करें और मेडिकल स्कूल पाठ्यक्रम की समीक्षा करें।

भारत सरकार ने बार-बार कहा है कि वो महिलाओं के खिलाफ हिंसा के लिए न्याय सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है। महिलाओं को नीचा दिखाने वाली पितृसत्तात्मक प्रथाओं को जारी रखने के बजाय, अधिकारियों को ये सुनिश्चित करना चाहिए कि चिकित्सा पेशेवर यौन उत्पीड़न से बचे लोगों के साथ सम्मान के साथ व्यवहार करें, उपचार और जांच के लिए विश्वास का एक सुरक्षित वातावरण प्रदान करें, और महत्वपूर्ण सहायता और चिकित्सीय देखभाल सेवाएं प्रदान करें।

रेप लॉ का इतिहास

रेप लॉ का इतिहास

शुरुआत में, रेप को कभी भी पीड़िता के खिलाफ अपराध के रूप में नहीं देखा जाता था, इसे संपत्ति के खिलाफ अपराध के रूप में देखते थे। उनके विचार में महिलाएं संपत्ति थीं जो अपने पति या पिता की थीं। शब्द "रेप" लैटिन शब्द 'रेपेरे' से आया है जिसका अर्थ है किसी ऐसी चीज को जब्त करना या लेना जो फिर से संपत्ति का संकेत देती है। पति या पिता को अपराध के लिए मुआवजा दिया गया था। हालांकि, अगर रेप होने वाली महिला विवाहित थी, तो उसे व्यभिचारिणी बना दिया और उसे उसको रेपिस्टस के साथ मौत की सजा दी जाती। हिब्रू के समान कानून थे और उन्होंने एक आंख के बदले एक आंख के विचार को बहुत गंभीरता से लिया। रेप की सजा के रूप में पीड़िता के पिता को रेपिस्ट की पत्नी से रेप करने की अनुमति दी गई। पूर्व-ब्रिटिश इंग्लैंड में सेल्टिक कानूनों ने महिलाओं के खिलाफ रेप को महिला के खिलाफ अपराध के रूप में मान्यता दी थी और यहां तक ​​कि बिना सहमति के, और ऐसी स्थिति में होने के बीच अंतर किया था जहां आप सहमति देने में असमर्थ हैं, जैसे नशा।

1860 के दशक में पहली बार आईपीसी द्वारा रेप को परिभाषित किया गया। इसे एक महिला की इच्छा या उसकी सहमति के विरुद्ध सेक्स के कार्य के रूप में परिभाषित किया गया था। इसमें पीड़ित को मृत्यु या चोट के डर से डालकर प्राप्त सहमति भी शामिल थी। रेप की परिभाषा अगले 100 वर्षों तक अपरिवर्तित रही। फिर मथुरा हिरासत में रेप मामले के बाद जहां अपराधियों को सुप्रीम द्वारा क्लीन चिट दे दी गई, रेप कानूनों में कुछ बड़े बदलाव हुए। हिरासत में रेप को रेप की परिभाषा में जोड़ा गया, जो एक पुलिस अधिकारी द्वारा किए गए रेप के संबंध में था। इसने 1872 के भारतीय साक्ष्य अधिनियम में 114 ए को सम्मिलित किया।

पॉक्सो एक्ट

पॉक्सो एक्ट

2001-2011 से राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो ने चाइल्ड रेप के मामलों में बड़ी वृद्धि दर्ज की। बिना सहमति 16 साल से कम उम्र के नाबालिग के साथ सैक्सुअल इंटरकोर्स अपराध करता था। चूंकि बाल शोषण के अधिकांश मामलों में अपराधी आमतौर पर बच्चे का करीबी होता है, इसलिए एक नया अधिनियम POCSO (यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण) 2012 बनाया गया था। इन मामलों में सुनवाई के दौरान पीड़िता की देखभाल की जिम्मेदारी पुलिस की थी। चाइल्ड पोर्नोग्राफी, बाल शोषण के लिए उकसाना, बच्चों का यौन उत्पीड़न सभी इस अधिनियम में शामिल थे।

निर्भया गैंग रेप केस

निर्भया गैंग रेप केस

16 दिसंबर 2012 को, चलती बस में एक लड़की का बेरहमी से गैंग रेप हुआ था ये निर्भया गैंग रेप का मामला था जिसने पूरे देश को हिलाकर रख दिया। इसने 2013 के आपराधिक संशोधन अधिनियम और किशोर न्याय अधिनियम को जन्म दिया। 2013 के आपराधिक संशोधन ने रेप की परिभाषा को चौड़ा कर दिया और गैंग रेप की सजा को 10 साल से बढ़ाकर उम्रकैद की सजा 20 साल से बढ़ाकर उम्रकैद कर दी।

आसिफा बानो रेप केस

आसिफा बानो रेप केस

जनवरी 2018 में जम्मू-कश्मीर के कठुआ जिले में, 8 साल की आसिफा बानो के साथ गैंग रेप किया और फिर उसे मार डाला गया। इसमें मुख्य आरोपी उस मंदिर का पुजारी था जहां रेप हुआ था। इस चौंकाने वाले मामले ने राष्ट्रीय विरोध प्रदर्शन हुए। 2018 के आपराधिक संशोधन अधिनियम को जन्म दिया, इस अधिनियम ने मुख्य रूप से POCSO को बदल दिया क्योंकि रेप एक बच्चे के साथ हआ था। इस अधिनियम ने 12 साल से कम उम्र की नाबालिग के साथ बलात्कार के अपराध के लिए मौत की सजा को संभव बनाया। न्यूनतम सजा 20 साल की जेल है। आईपीसी में एक और धारा डाली गई थी जिसमें 16 साल से कम उम्र की नाबालिग के खिलाफ रेप के अपराध में 20 साल से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा थी।

आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम, 2018

आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम, 2018

11 अगस्त 2018 को पारित किया गया था। संशोधनों का रेट्रोस्पेटिव इफेक्ट है। संशोधन से पहले, रेप के लिए न्यूनतम सात साल की कैद की सजा थी, लेकिन अब सजा को बढ़ाकर न्यूनतम दस साल कर दिया गया है। इसके अलावा, भारतीय दंड संहिता की धारा 376AB, धारा 376DA, धारा 376DB नाम से नए अपराध जोड़े गए हैं। इससे पहले, नाबालिग के रेप से निपटने के लिए कोई कड़े प्रावधान नहीं थे। हालांकि, नए संशोधन में नाबालिगों से रेप के लिए कड़ी सजा का प्रावधान है।

(Reference- BBC, Blog.ipleaders.in, lawinsider.in )

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