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महिलाओं को अपने हक की लड़ाई हर दौर में ही लड़नी पड़ी है। चाहे वो परिवार से हो या समाज ये सा फिर देश से। महिलाओं को उनके अधिकार कभी दिये नहीं गये बल्कि उनको लड़ाईयां लड़कर अपने अधिकार लेने पड़े। अमेरिका, जो आज के वक्त की सुपर पावर है उसने भी अपने देश की महिलाओं को उनका हक देने में दशकों लगा दिये। वहां कि महिलाओं को किसी भी तरह के अधिकार नहीं मिले हुए थे। चाहे वो आर्थिक हो या राजनैतिक। महिलाओं को इन सारे अधिकारों को प्राप्त करने के लिए एक लंबा रास्ता तय करना पड़ा, जिसकी वे हकदार थीं। लेकिन देर से ही सही, महिलाओं को 1920 में संयुक्त राज्य अमेरिका में वोट देने का अधिकार मिला। महिलाओं को वोट देने का अधिकार 26 अगस्त, 1920 को दिया गया था, इसलिए यूनाइटेड स्टेट ऑफ अमेरिका में इस दिन को महिला समानता दिवस के रूप में सेलिब्रेट किया जाता हैं।

किसी भी लोकतंत्र का फाउंडेशन स्टोन है 'मतदान का अधिकार'
मतदान का अधिकार, किसी भी लोकतंत्र का फाउंडेशन स्टोन है और ये हक वहां रहने वाले सभी नागरिकों को मिलता है, लेकिन हमेशा से ऐसा नहीं था। अधिकांश देशों ने अपनी आधी आबादी यानि कि महिलाओं को मतदान के अधिकार से वंचित किया हुआ था। अमेरिका की महिलाओं ने 19वीं सदी की शुरुआत में वोटिंग के अधिकार के लिए आंदोलन शुरू कर दिया। इस आन्दोलन ने कई दौर देखे और अंत में जीत उनकी हुई। वीमेन इक्वेलिटी डे उन संघर्षों की याद दिलाता है जिनका सामना महिलाएं रोज ही करती हैं। चाहे वो फाइनेंशली हो या उनकी पढ़ाई को लेकर हो, या फिर परिवार में बराबरी, इन सब को लड़कियों और महिलाओं अपने घरों में ही झेलना पड़ता है और अपने हक के लिए बोलना पड़ता है।

1830 के दशक में सिर्फ पुरुषों के मिला था वोट देने का अधिकार
1830 के दशक में अमेरिका जैसे बड़े देश में सिर्फ अमीर लोगों और श्वेत पुरुषों को ही वोट देना का अधिकार मिला हुआ था। महिलाएं और गुलाम इस अधिकार में शामिल नहीं थी। इसके बाद संयुक्त राज्य अमेरिका में सिविल वॉर से पहले, महिलाओं ने अपने मताधिकार को पाने के लिए आंदोलन शुरू कर दिया था। 1972 में, राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने ये घोषणा 4147 जारी की, जिसने 26 अगस्त 1972 को "महिला अधिकार दिवस" के रूप में नामित किया। ये महिला समानता दिवस की पहली आधिकारिक घोषणा थी। 1971 में रिप्रेजेंटेटिव बेला अब्ज़ग (डी-एनवाई) के आदेश पर और 1973 में पारित, यू.एस. कांग्रेस ने 26 अगस्त को "महिला समानता दिवस" के रूप में नामित किया। जिसमें महिलाओं को ‘वोट देने का अधिकार' प्रदान करने वाले संविधान में 19वें संशोधन के 1920 के सर्टिफिकेशन के सेलिब्रेशन में डेट सेलेक्ट की गई थी। जो महिलाओं द्वारा एक बड़े लेकिन शांतिपूर्ण नागरिक अधिकार आंदोलन का रिजल्ट था।इस आंदोलन की शुरूआत 1848 में सेनेका फॉल्स, न्यूयॉर्क में दुनिया के पहले महिला अधिकार सम्मेलन में हुई थी। विमेन इक्वेलिटी डे का आयोजन न केवल 19वें संशोधन के पारित होने की याद दिलाता है, बल्कि महिलाओं के अंदर आत्मविश्वास जगाने का काम करता है।

महिलाओं को उनका हक 50 सालों के संघर्ष के बाद मिला
महिलाओं को अपना हक पाने के लिए लगभग 50 सालों से अधिक का समय लगा। वहां की महिलाएं पूरे जोश के साथ अपने इस आंदोलन के साथ खड़ी रहीं और वहां की सरकार से लोहा लिया और आंदोलन किया जिसका परिणाम ये हुआ कि 26 अगस्त 1920 को वहां की महिलाओं ने पुरुषों से बराबरी का दर्जा प्राप्त कर लिया।

भारत में महिला समानता-
किसी भी देश के डेवलपमेंट के लिए वहां पर लैंगिक समानता का होना सबसे ज्यादा जरूरी माना जाता है, लेकिन अभी भी भारत जो अपनी आजादी का 75वां अमृत महोत्सव मना रहा है, जेंडर बेस्ड डिस्क्रिमिनेशन यहां पर काम कर रहा है। चाहे परिवार हो या एजुकेशन, ऑफिस या फिर राजनीति में हर जगह पर लैंगिक भेदभाव नजर आ जाता है। वर्ल्ड इकनोमिक फोरम की साल 2021 के ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स में भारत 156 देशों की सूची में 140 नंबर पर हैं। इस रैंक से ये साबित होता है कि आज भी भारत में में लैगिंक भेदभाव ने अपनी जड़े कस कर जमाई हुई हैं।
महिलाओं के खिलाफ हिंसा बंद नहीं हुई है। महिलाओं को हर प्लेस पर इसका सामना करना पड़ता है। महिलाओं के खिलाफ हिंसा आमतौर पर जेंडर बेस्ड होती है। जेंडर इक्वेलिटी महिला और पुरुष दोनों के लिए समान अधिकार व समान अवसर प्रदान करने का है। चाहे वो घर पर हो या शैक्षणिक संस्थानों में या फिर कार्यस्थल। लैंगिक समानता महिलाओं को पॉलिटिकल, सोशल व इकनॉमिक इक्वेलिटी की गारंटी देती है।



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