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दुनिया की तमाम लड़कियों और महिलाओं चाहे वो किसी भी देश की क्यों ना हों, उनको पता होता है, वो कहां पर कंफर्ट महसूस कहती हैं और कहां नहीं, क्योंकि उनको मालूम होता है सामने वाला उसे किन निगाहों से देख रहा है, उसे समझ होती है, लेकिन समाने वाले को ये ना बताना कि वो गलत कर रहा है, ये उस तकलीफ को सहने वाली महिला की भी कहीं ना कहीं गलती की वजह से होता है, क्योंकि वो समाज, परिवार का डर अपने अंदर समाए होती है, कि कहीं अगर बोल दिया तो, लोग उसे ही गलत समझेंगे, इसका नतीजा ये है, कि वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के अनुसार, हर 3 में से 1 महिला ने अपनी जिंदगी में यौन शोषण का सामना किया होता है।
इस मामले में भारत भी अछूता नहीं है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के डेटा के अनुसार 2020 में, भारत के 19 मेट्रो सिटीज में महिलाओं के खिलाफ क्राइम के कुल 35331 मामले दर्ज हुए। लेकिन भारत में महिलाओं के लिए कानूनों की कोई कमी नहीं है। भारत के संविधान में महिलाओं को सुरक्षा और विकास के लिए विशेष अधिकार प्रदान किया है। इसके साथ ही जब महिलाओं की सुरक्षा की बात आती है तो आईपीसी, सीआरपीसी और साक्ष्य अधिनियम भी एक्टिव होते हैं। महिलाओं के खिलाफ दुर्व्यवहार, उत्पीड़न, हिंसा, असमानता आदि के खिलाफ उनके अधिकारों की सुरक्षा के लिए हमारे पास कुछ विशेष कानून भी हैं। आज महिला समानता दिवस पर इस लेख में आपको, आपके अधिकारों के बारें में बताने जा रहे जो भारतीय संविधान ने भारत की हर महिला को सौंपे हुए हैं और सभी इंडियन विमेंस को अपने राइट्स के बारें में मालूम होना चाहिए।

मेंटेनेंस पाने का अधिकार
भरण-पोषण के लिए मूलभूत आवश्यकताएं जैसे भोजन, आवास, कपड़े, शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं ये सब इसमें शामिल है। एक विवाहिता अपने पति से तलाक के बाद भी दोबारा शादी न करने तक भरण-पोषण पाने की हकदार होती है। दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 125, पति पर अपनी तलाकशुदा पत्नी का भरण-पोषण करने का दायित्व होता है। कोई भी भारतीय महिला चाहे उसकी जाति और धर्म कोई भी हो, अपने पति से भरण-पोषण का दावा कर सकती है।

गरिमा और शालीनता का अधिकार
मर्यादा और शालीनता महिलाओं का मान होता है। जो कोई भी उसकी शील को छीनने और भंग करने की कोशिश करता है, उसे अपराधी माना जाता है। कानून उसे इसकी सजा देता है। भारत की कोई भी महिला भय, जबरदस्ती, हिंसा और भेदभाव से मुक्त गरिमा से जीने का अधिकार रखती है। आपराधिक कानून महिलाओं के खिलाफ किए गए अपराधों के लिए दंड का प्रावधान करता है जैसे यौन उत्पीड़न (धारा 354A), उसके कपड़े उतारने के इरादे से हमला (धारा 354बB) या उसकी शील भंग करने के लिए (धारा 354), पीछा करना (354D) आदि। अगर महिला पर खुद किसी अपराध का आरोप लगता है तो उसे गिरफ्तार किया जाता है, तो उसके साथ अच्छा व्यवहार किया जाता है। रेप के मामलों में, जहां तक संभव हो, एक महिला पुलिस अधिकारी को FIR दर्ज करनी चाहिए। इसके अलावा, उसे सूर्यास्त के बाद और सूर्योदय से पहले एक महिला पुलिस अधिकारी द्वारा मजिस्ट्रेट की विशेष अनुमति के अलावा गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है।

समान वेतन का अधिकार
अब हमारे पास जैंडर न्यूट्रल लॉ हैं। एक पुरुष और एक महिला समान काम के लिए समान वेतन पाने के हकदार हैं। समान पारिश्रमिक अधिनियम में प्रावधान है। ये समान काम या समान प्रकृति के कार्य के लिए पुरुष और महिला श्रमिकों दोनों को समान पारिश्रमिक का भुगतान सुनिश्चित करता है। भर्ती और सेवा शर्तों के संदर्भ में जेंडर को आधार नहीं माना जा सकता।

घरेलू हिंसा के खिलाफ अधिकार
भारत के संविधान द्वारा साल 2005 में घरेलू हिंसा से महिलाओं के संरक्षण अधिनियम के अधिनियमन लागू होने के आधार पर प्रत्येक महिला घरेलू हिंसा के खिलाफ बोलने की हकदार है। डॉमेस्टिक वॉइलेंस में न केवल शारीरिक शोषण बल्कि मानसिक, यौन, आर्थिक शोषण भी शामिल है। अगर आप एक बेटी या फिर पत्नी या लिव-इन पार्टनर हैं और आपका पार्टनर या पति या उसके रिश्तेदारों या फिर उससे रिलेटेड व्यक्ति द्वारा किसी भी तरह का मिसबिहेव किया जाता है, तो आप घरेलू हिंसा अधिनियम के प्रावधानों के तहत उसको सजा दिलवा सकती हैं। महिला हेल्पलाइन नंबर "1091" पर संपर्क कर सकते हैं। आप अपना मामला दर्ज करने के लिए पुलिस से भी संपर्क कर सकते हैं।

कार्यस्थल पर अधिकार
आप जहां भी काम कर रहे हैं वहां पर विमेन टॉयलेट का होना आपका अधिकार है। इसके साथ ही जिन स्थानों पर 30 से अधिक महिला कर्मचारी हैं, वहां बच्चों की देखभाल और खाने की सुविधा उपलब्ध कराना अनिवार्य है। सुप्रीम कोर्ट और भारत सरकार ने कार्यस्थलों पर महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए दिशा निर्देश जारी किये हैं। साल 2013 में, एक विशेष कानून बनाया है- कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 सरकार के द्वारा बनाया गया है।

दहेज के खिलाफ अधिकार
शादी के पहले या शादी के बाद में दूल्हे या दुल्हन या उनके माता-पिता द्वारा दहेज देना और लेना दहेज निषेध अधिनियम, 1961 द्वारा सजा का प्रावधान है। ये उन व्यक्तियों के मामले में दहेज या महर शामिल नहीं है जिन पर मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) लागू होता है। यदि आप दहेज देते हैं, लेते हैं या देते हैं या लेने के लिए उकसाते हैं, तो आपको कम से कम 5 साल की कैद और 15,000 रुपये का जुर्माना हो सकता है।
भारत का कानून महिलाओं की रक्षा करता है। ये बुनियादी अधिकार भारत की हर महिला को जानना चाहिए। अपने अधिकारों के बारे में जागरूक होना आपका अधिकार है। तभी आप अपने साथ घर, कार्यस्थल या समाज में होने वाले किसी भी अन्याय के खिलाफ लड़ सकते हैं।



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