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Rajasthan Election 2023: बांसवाड़ा के इस मंदिर का है चुनाव से कनेक्शन, आर्शीवाद में मिलती है 'सत्ता'
Tripura Sundari Temple in Banswara Rajasthan : राजस्थान में मतदान हो चुके हैं अब बारी है नतीजों की। 3 दिसंबर को मतगणना शुरु हो जाएगी और राज्य को मिलेगा नया मुख्यमंत्री। लेकिन काउंटिंग से पहले ही राजस्थान के बांसवाड़ा स्थित मां त्रिपुरा सुंदरी का मंदिर इन दिनों चर्चाओं में बना हुआ है। त्रिपुरा सुंदरी मंदिर के साथ कई पौराणिक मान्यताएं और आस्था जुड़ी हुई है।
सीएम गहलोत ही नहीं बल्कि पूर्व सीएम वसुंधरा राजे के अलावा भी कई राजनेता बांसवाड़ा आने पर मां त्रिपुरा सुंदरी के दर्शन ज़रूर करते हैं।
नेताओं की पसंदीदा मंदिर होने की वजह से यहां विराजमान मां भगवती को सत्ता की देवी भी कहा जाता है। माना जाता है कि इस मंदिर में आने वाला कभी खाली हाथ नहीं गया। आइए जानते हैं इस मंदिर का इतिहास और खासियत-

सत्ता देने वाली देवी
हर चुनाव में काउंटिंग के दिन या उससे पहले वसुंधरा मंदिर जाती हैं और देवी की आराधना करती हैं। वसुंधरा साल 2013 में राजस्थान चुनाव जीतने में सफल रही थीं और उन्हें 165 सीटें मिली थीं। इस एकतरफा और बड़ी जीत के बाद वह दूसरी बार सीएम की कुर्सी पर बैठी थीं। वह हर चुनाव के दौरान यहां जाती हैं और काउंटिंग के दिन भी दर्शन करती हैं। ऐसा वह पिछले 5 चुनाव से कर रही हैं।
सिर्फ पूर्व सीएम वसुंधरा राजे ही नहीं बल्कि ग्राम चुनाव से लेकर होने वाले हर मुख्य चुनाव में जीतने की इच्छा लेकर ग्राम प्रधानों से लेकर मंत्रियों तक, सभी पार्टियों के राजनेता, उमराई गांव में त्रिपुरा सुंदरी मंदिर में नियमित रूप से आते हैं। इसी साल सीएम अशोक गहलोत भी अपनी पार्टी के मंत्रियों सहित इस मंदिर में दर्शन करने पहुंचे थे।

शक्ति पीठ के रूप में प्रसिद्ध
बता दें कि त्रिपुर सुंदरी मंदिर राजस्थान के बांसवाड़ा जिले के मुख्यालय से 19 किमी की दूरी पर स्थित है। त्रिपुरा सुंदरी देवी के मंदिर को तरतई माता यानी तुरंत परिणाम देने वाली मां के नाम से भी जाना जाता है। मंदिर में काले पत्थर पर खुदी हुई देवी की एक मूर्ति प्रतिष्ठित है। बताया जाता है कि यह मंदिर कुषाण तानाशाह के शासन से भी पहले बनाया गया था। मंदिर एक 'शक्ति पीठ' के रूप में प्रसिद्ध है और जो हिंदू देवी शक्ति या देवी पार्वती की पूजा करते हैं, वे यहां पहुंचते हैं।
राजा महाराजा रहें उपासक
गुजरात, मालवा और मारवाड़ के शासक त्रिपुरा सुन्दरी के उपासक थे। गुजरात के सोलंकी राजा सिद्धराज जयसिंह की यह इष्ट देवी रहीं। कहा जाता है कि मालव नरेश जगदेव परमार ने तो मां के श्री चरणों में अपना शीश ही काट कर अर्पित कर दिया था। उसी समय राजा सिद्धराज की प्रार्थना पर मां ने पुत्रवत जगदेव को पुनर्जीवित कर दिया था।
51 शक्तिपीठ में से एक
बताया जाता है कि 1982 में खुदाई के दौरान यहां शिव पार्वती की मूर्ति निकली थी, जिसके दोनों तरफ रिद्धि-सिद्धि सहित गणेश व कार्तिकेय भी हैं। प्रचलित पौराणिक कथानुसार दक्ष-यज्ञ तहस-नहस हो जाने के बाद शिवजी सती की मृत देह कंधे पर रख कर झूमने लगे। तब भगवान विष्णु ने सृष्टि को प्रलय से बचाने के लिए योगमाया के सुदर्शन चक्र की सहायता से सती के शरीर को खण्ड-खण्ड कर भूतल पर गिराना आरम्भ किया। उस समय जिन-जिन स्थानों पर सती के अंग गिरे, वे सभी स्थल शक्तिपीठ बन गए। ऐसे 51 शक्तिपीठ हैं और उन्हीं में से एक शक्तिपीठ है त्रिपुरा सुंदरी।
मंदिर का इतिहास
मंदिर का जीर्णोद्धार तीसरी शती के आस-पास पांचाल जाति के चांदा भाई लुहार ने करवाया था। मंदिर के समीप ही भागी (फटी) खदान है, जहां किसी समय लोहे की खदान हुआ करती थी। किंवदांती के अनुसार एक दिन त्रिपुरा सुंदरी भिखारिन के रूप में खदान के द्वार पर पहुंची, लेकिन पांचालों ने उस तरफ ध्यान नहीं दिया। देवी ने क्रोधवश खदान ध्वस्त कर दी, जिससे कई लोग काल के ग्रास बने। देवी मां को प्रसन्न करने के लिए पांचालों ने यहां मां का मंदिर तथा तालाब बनवाया। इस मंदिर का 16वीं शती में जीर्णोद्धार कराया गया। आज भी त्रिपुरा सुन्दरी मंदिर की देखभाल पांचाल समाज ही करता है।



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