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आखिर क्या हुआ जब भगवान जगन्नाथ को चढ़ाई जानें लगी मछली? पढ़ें पूरी पौराणिक कथा
Is fish offered to Lord Jagannath : भगवान जगन्नाथ की लीलाएं अत्यंत रहस्यमयी और भक्तिभाव से परिपूर्ण मानी जाती हैं। उनकी भक्ति में समर्पित अनेक कथाएं प्रचलित हैं, जिनमें से एक कथा भगवान को मछली अर्पित किए जाने से जुड़ी है। यह सुनकर कई लोग चौंक सकते हैं, क्योंकि सामान्यतः देवताओं को शुद्ध सात्विक भोजन ही अर्पित किया जाता है।
जगन्नाथ पुरी मंदिर में भगवान को प्रतिदिन 56 प्रकार का भोग अर्पित किया जाता है, जिसे छप्पन भोग कहा जाता है। यह संपूर्ण रूप से सात्विक और पारंपरिक भोजन होता है। शास्त्रों के अनुसार भगवान को वही भोग चढ़ाया जाता है जो सात्विक और शुद्ध हो। ऐसे में मछली जैसे तामसिक पदार्थ का भोग अर्पित करने की बात हैरानी में डाल सकती है, लेकिन इसके पीछे एक मार्मिक पौराणिक कथा जुड़ी है।

यह है पौराणिक कथा
कहानी के अनुसार, एक बार एक मछुआरिन अत्यंत श्रद्धा भाव से भगवान जगन्नाथ के दर्शन के लिए निकली। रास्ते में उसे याद आया कि वह भगवान को कोई भेंट लेकर नहीं आई है। ऐसे में उसने nearby बाजार से एक ताजी मछली खरीद ली ताकि उसे भगवान को भेंट कर सके। उसका भाव शुद्ध और भक्ति से भरा हुआ था।
जब वह मंदिर पहुंची और गर्भगृह में प्रवेश करने लगी, तो मंदिर के पुजारियों को उसकी झोली से आती मछली की गंध महसूस हुई। उन्होंने उसे रोक दिया और मछली लेकर मंदिर में प्रवेश करने से मना कर दिया। इससे मछुआरिन बहुत दुखी होकर लौट गई और घर पहुंचकर रोने लगी।
उसकी सच्ची भक्ति और पीड़ा देखकर भगवान जगन्नाथ स्वयं प्रकट हुए। उन्होंने उस मछुआरिन के भाव को स्वीकार किया और मछली को अपनी ऊर्जा में समाहित कर लिया, हालांकि उन्होंने उसे खाया नहीं। इसके पीछे का संदेश यही था कि भगवान भावना के भूखे होते हैं, भोग के नहीं।
इसके बाद भगवान ने मछुआरिन को आशीर्वाद दिया कि वर्ष में एक बार वह स्वयं मछुआरा समाज में प्रकट होंगे। यही कारण है कि कुछ समुदायों में आज भी मान्यता है कि भगवान को मछली अर्पित की जाती है, जबकि वास्तविकता यह है कि मंदिर में केवल सात्विक भोग ही अर्पित होता है।
यह कथा इस बात को दर्शाती है कि सच्ची भक्ति जाति, समाज या पेशे से नहीं जानी जाती, बल्कि केवल भाव से पहचानी जाती है।



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