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Solar Eclipse 2024 : चंद्रग्रहण हो या सूर्यग्रहण, इन मंदिरों को कपाट नहीं होते हैं बंद, जानें रहस्य
Surya Grahan 2024: इस साल का पहला सूर्यग्रहण 8अप्रैल 2024 को लगने जा रहा है। भारतीय समयानुसार यह ग्रहण 9 बजकर 12 मिनट से शुरू होकर देर रात 2 बजकर 22 मिनट तक रहेगा। इस ग्रहण का कुल सूतक 5 घंटे 10 मिनट का रहेगा। हालांकि भारत में यह सूर्यग्रहण नजर नहीं आएगा तो इसका सूतक काल भी मान्य नहीं होगा।
हालांकि धार्मिक ग्रंथो में सूर्य ग्रहण हो या चंद्र ग्रहण इन खगोली घटना को अशुभ माना गया है। इस दौरान पूजा पाठ भी नहीं किया जाता। ग्रहण के नियम सूतक काल से ही शुरू हो जाते हैं।
सूर्य ग्रहण से 12 घंटे पहले सूतक काल शुरू लग जाता है। ऐसे में सूतक काल से ही पूजा पाठ नहीं किया जाता और मंदिर के कपाट बंद हो जाते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि देश में ऐसे कई मंदिर हैं जिन पर ग्रहण का सूतक काल
मान्य नहीं होता है और इन मंदिरों के कपाट भी बंद नहीं होते हैं।

आइए जानते हैं इन मंदिरों से जुड़े रहस्यों के बारे में-
विष्णुपद मंदिर, गया (Vishnupad Temple)
बिहार के गया के विष्णुपद मंदिर ग्रहण के दौरान बंद नहीं किया जाता। इस मंदिर पर सूतक मान्य नहीं होता है। सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण में भी इस मंदिर के कपाट खुले रहते हैं। ग्रहण के दिन मंदिर की मान्यता बढ़ जाती क्योंकि ग्रहण के दौरान यहां पिंडदान किए जाते हैं।
महाकाल मंदिर, उज्जैन, मध्यप्रदेश (Mahakal Temple )
उज्जैन स्थित महाकालेश्वर मंदिर के कपाट ग्रहण काल के दौरान बंद नहीं होते, मान्यता है कि महाकाल स्वयं ही काल, चक्र और समय के स्वामी हैं। इस वजह से इस मंदिर में ग्रहण के दौरान भी पट बंद नहीं किए जाते है। मंदिर में ग्रहण का कोई असर नहीं होता है।
श्रीकालहस्ती मंदिर आंध्र प्रदेश (Srikalahasti Temple )
श्रीकालहस्ती मंदिर आंध्र प्रदेश के रायलसीमा क्षेत्र के चित्तूर जिले में स्थित है। यह मंदिर चाहे सूर्यग्रहण हो या चंद्रग्रहण हमेशा खुला रहता है।
ग्रहण के समय मंदिर में भगवान वायु लिंगेश्वर के देवता का विशेष अभिषेक किया जाता है। । सूर्य ग्रहण के दौरान मंदिर में भगवान शिव और देवी अम्मावरु के दर्शन के लिए काफी भीड़ दर्शन के लिए पहुंचती है। ऐसा माना जाता है कि जिन लोगों की कुंडली में दोष हैं वो यहां ग्रहण के दौरान विशेष राहु और केतु की पूजा करवाने आते हैं।
कल्पेश्वर तीर्थ, गोपेश्वर, उत्तराखंड (Kalpeshwar Nath temple)
चंद्रग्रहण के दौरान उत्तराखंड का कल्पेश्वर तीर्थ भी खुला रहता है। मान्यता हैं कि भगवान शिव ने यहीं अपनी जटाओं से मां गंगा को रोका था। भगवान शिव के जटा भाग होने के वजह से इस मंदिर के गर्भग्रह में ताला नहीं लगाया जाता है। समुद्र मंथन के दौरान यहीं पर देवताओं और दानवों की बैठक हुई थी। ग्रहण के दौरान कल्पेश्वर मंदिर बंद नहीं किया जाता है।
ग्रहण के दौरान क्यों बंद रहते हैं मंदिर?
सूर्य ग्रहण या चंद्रग्रहण के दौरान सूतककाल में भारत के चारों धामों सहित अधिकांश प्राचीन मंदिर बंद रहते हैं। ग्रहण के दौरान मंदिर के गृभकाल में पूजा करने की मनाही होती है। सूतककाल खत्म होने के बाद ही मंदिरों की शुद्धि होती है उसके बाद ही पूजा की जाती हैं।
माना जाता है कि ग्रहण के दौरान सभी ग्रह नकारात्मक ऊर्जा छोड़ते है। ग्रह पिंडों द्वारा उत्सर्जित नकारात्मक ऊर्जा से मंदिर की मूर्तियों को नुकसान पहुंच सकता है। इस नुकसान से बचने के लिए सूर्य की किरणों को मंदिर के अन्दर पहुंचने से रोक दिया जाता है। इस वजह से मंदिर के कपट बंद रहते हैं।



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