Latest Updates
-
पार्टी में जल्दी बिगड़ जाता है मेकअप? केकी और पैची लुक से बचने के लिए अपनाएं ये 5 टिप्स -
दशहरा के बाद दिल्ली की हवा हुई जहरीली, 200 के पार पहुंचा AQI, प्रदूषण से बचाव के लिए फॉलो करें ये टिप्स -
कुल्लू दशहरा में नहीं जलता रावण का पुतला, देवलोक से आते हैं देवी-देवता, जानिए क्या है सदियों पुरानी परंपरा -
Papankusha Ekadashi 2026: कब है पापांकुशा एकादशी? जानें तिथि, शुभ मुहूर्त, महत्व और पूजा विधि -
Navratri Ke Baad Jau Ka Kya Kare: नवरात्रि समाप्त होने के बाद उगे हुए जौ का क्या करें? जानें सही नियम और उपाय -
दीपिका पादुकोण-रणवीर सिंह ने किया दूसरी बेटी के नाम का खुलासा, दशहरे पर दिखाई पहली झलक -
Shardiya Navratri 2026 Day 8: नवरात्रि के आठवें दिन करें मां महागौरी की पूजा, जानें विधि, मंत्र, भोग और आरती -
Durga Ashtami 2026 Wishes: महागौरी की कृपा...इन संदेशों के साथ अपनों को दें दुर्गा अष्टमी की शुभकामनाएं -
सिर्फ गांठ ही नहीं, ये 5 संकेत भी हो सकते हैं ब्रेस्ट कैंसर का लक्षण, साधारण समझकर इग्नोर करने की न करें भूल -
Maha Navami 2026: 19 या 20 अक्तूबर, महानवमी कब है? जानें तिथि, हवन और कन्या पूजन का शुभ मुहूर्त
Uttarkashi Cloudburst : हर बार क्यों उत्तरकाशी के लिए कहर बनकर आता है अगस्त? जानें 5 तारीख से कनेक्शन
Uttarkashi Cloudburst : उत्तरकाशी, उत्तराखंड का खूबसूरत लेकिन आपदाग्रस्त जिला, हर साल प्राकृतिक त्रासदियों का सामना करता है। खासकर 5 अगस्त की तारीख यहां के लिए एक भयावह याद बन चुकी है। 5 अगस्त 1978 को कनोडिया में आई बाढ़ ने भारी तबाही मचाई थी, जिसमें सैकड़ों लोगों की जान गई और कई गांव बर्बाद हो गए। इसके बाद 1991 में आए भूकंप और 2022 की आपदा ने उत्तरकाशी को फिर झकझोर दिया। 5 अगस्त 2025 को धराली क्षेत्र में आई त्रासदी ने एक बार फिर वही दर्दनाक मंज़र दोहरा दिया। लोग चट्टानों के नीचे दबे, नदियां उफान पर रहीं और परिजन अपनों को तलाशते रह गए।
भूगर्भीय रूप से संवेदनशील उत्तरकाशी में हर कुछ वर्षों में इस तरह की आपदाएं आना चिंताजनक है। 5 अगस्त अब सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि उत्तरकाशी के लिए एक काला दिन बन चुकी है, जो हर बार पुराने जख्मों को ताजा कर जाती है।

1978 की आपदा: विनाश की पहली बड़ी याद
5 अगस्त 1978 को उत्तरकाशी के कनोडिया गांव में मूसलधार बारिश और भूस्खलन से भागीरथी घाटी में विनाशकारी बाढ़ आई। मलबा जमा होने के बाद जब नदी ने रास्ता बनाया, तो तबाही मच गई। सैकड़ों लोग मारे गए, घर-खेत सब नष्ट हो गए। यह घटना उत्तरकाशी की सबसे भयावह प्राकृतिक घटनाओं में से एक मानी जाती है।
5 अगस्त 2025: इतिहास ने खुद को दोहराया
47 साल बाद, 5 अगस्त 2025 को फिर वही डरावना दृश्य उत्तरकाशी के धराली क्षेत्र में सामने आया। बादल फटने की घटना में धराली बाजार के कई होटल, होमस्टे और मकान बह गए। लगभग 50 लोग लापता हैं और 4 लोगों की मौत की पुष्टि हुई है। ये आंकड़ा अभी और बढ़ सकता है। इस त्रासदी ने 1978 की आपदा के घाव फिर से हरे कर दिए।
India: A devastating cloudburst in Dharali village, Uttarkashi (Uttarakhand), today triggered flash floods and a massive mudslide, sweeping away homes, hotels, and shops.
— RenderNature (@RenderNature) August 5, 2025
Many people are feared buried, and rescue efforts by the Army and NDRF are ongoing. pic.twitter.com/nhwNEXgx13
क्यों उत्तरकाशी में आती है बार-बार आपदाएं
उउत्तरकाशी जिला भूकंप जोन-4 और 5 में आता है, जो इसे अत्यधिक संवेदनशील बनाता है। नाजुक पहाड़ी भू-संरचना, तेज बारिश, भूस्खलन और अनियोजित निर्माण मिलकर हर साल इस क्षेत्र में आपदा की संभावना को बढ़ा देते हैं।
त्रासदियों का सिलसिला थमा नहीं
उत्तरकाशी एक नहीं, कई बार प्राकृतिक आपदाओं का शिकार बना है, इन 47 सालों की ही बात करें, तो सैकड़ों लोगों ने अपनी जान गंवाई है और भारी जानमाल का नुकसान हुआ है।
1991 का भूकंप: 20 अक्टूबर को 6.8 तीव्रता का भूकंप आया, जिसमें 768 लोगों की मौत हुई और 1800 से अधिक लापता हो गए।
1999, 2009, 2011 और 2015 में फिर भूकंप आए, जिनकी तीव्रता 5.7 से 7.8 तक रही।
2003: वरुणावत पर्वत से भूस्खलन ने शहर के बड़े हिस्से को बर्बाद कर दिया। गोफियारा और मस्जिद मोहल्ले में भारी नुकसान हुआ।
2012-13: अस्सी गंगा और भागीरथी नदी में बाढ़ आई, जिसने गांवों को तबाह किया।
2019: आराकोट (मोरी ब्लॉक) क्षेत्र में बादल फटा, जिसमें कई लोगों की जान गई और फसलें व संपत्ति बर्बाद हो गई।
2022: दौप्रदी के डांडा में हिमस्खलन में 29 पर्वतारोहियों की मौत हुई।
2023: सिलक्यारा सुरंग हादसे में 41 मज़दूर 17 दिनों तक सुरंग में फंसे रहे, जिन्हें बाद में सकुशल निकाला गया।
लोक साहित्य में भी मिलता है जिक्र
उत्तरकाशी के लोक साहित्य और लोकगीतों में भी अगस्त महीने की त्रासदियों को दर्ज किया गया है। कवि घनश्याम "सैलानी" ने लिखा है -
"छै अगस्त उन्नीस अट्ठोत्तर .... गंगा जी मां कम थौ पाणी, पता चले कि पाड़ टूटे..."
यह गीत 1978 की आपदा की स्मृति है, जो बताता है कि कैसे स्थानीय लोग भी अगस्त को त्रासदी के महीने के रूप में याद करते हैं।



Click it and Unblock the Notifications
