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एक पत्नी और 5 पति! उत्तराखंड के इस गांव में आज भी जिंदा है 'पांचाली विवाह' की परंपरा, जानें पीछे की सच्चाई
Uttarakhand One wife five husbands story: भारत की देवभूमि कहे जाने वाले राज्य उत्तराखंड में आज भी एक ऐसी परंपरा जीवित है, जिसे सुनकर आधुनिक दुनिया के लोग हैरान रह जाते हैं। जहां आज के दौर में रिश्तों में मामूली अनबन पर तलाक हो जाते हैं, वहीं देहरादून के पास एक ऐसा गांव है जहां महाभारत के समय की 'बहुपतित्व' (Polyandry) प्रथा का पालन आज भी पूरी निष्ठा से किया जा रहा है। यहां की महिलाएं आधुनिकता के इस दौर में भी 'द्रौपदी' की तरह एक ही घर के सभी भाइयों की पत्नी बनकर रहती हैं।
आप सोच रहे होंगे कि हम ये क्या लिख रहे हैं और भला आज के समय में ऐसा कैसे संभव है। मगर आपको बता दें कि जो हम बता रहे हैं वो एकदम सही बात है। हां, हमें पता है कि आपकी उत्सुकता इस बारे में जानने के लिए बढ़ गई होगी। तो चलिए फिर आइए जानते हैं उत्तराखंड के इस गांव की एक ऐसी ही हैरान कर देने वाली कहानी और इस प्रथा के पीछे की असल वजह।

आधुनिक युग की 'द्रौपदी'
इतिहास और पौराणिक कथाओं में हमने 'पांचाली' यानी द्रौपदी के बारे में पढ़ा है, जिन्होंने पांच पांडवों से विवाह किया था। लेकिन 21वीं सदी के भारत में भी एक ऐसा परिवार है जहां राजो वर्मा नाम की महिला अपने 5 पतियों जो आपस में सगे भाई हैं के साथ एक खुशहाल जीवन जी रही हैं। ये कोई स्क्रिप्टिड कहानी नहीं है बल्कि हकीकत जिंदगी है।
राजो वर्मा की हैरान करने वाली कहानी
देहरादून के पास स्थित एक गांव की रहने वाली 23 साल की राजो वर्मा की कहानी किसी फिल्म की स्क्रिप्ट जैसी लगती है। राजो का विवाह पहले हिंदू रीति-रिवाज से गुड्डू वर्मा के साथ हुआ था। लेकिन परंपरा के अनुसार, उन्हें गुड्डू के बाकी चार भाइयों-बैजू, संतराम, गोपाल और दिनेश को भी अपना पति स्वीकार करना पड़ा। शादी के बाद राजो हर रात अलग-अलग भाई के साथ समय बिताती हैं। दिलचस्प बात यह है कि इस परिवार में किसी भी भाई के मन में एक-दूसरे के प्रति ईर्ष्या या जलन का भाव नहीं है।
कौन है राजो के बच्चे का पिता
बता दें कि राजों का एक 4 साल का बेटा है, लेकिन वह खुद यह नहीं जानतीं कि उन पांचों भाइयों में से बच्चे का जैविक पिता कौन है। इस परिवार में सभी भाई मिलकर बच्चे की परवरिश करते हैं और सभी उसे अपना ही बेटा मानते हैं। राजो का कहना है कि शुरू में उन्हें यह थोड़ा अजीब लगा था, लेकिन उनकी मां ने भी तीन भाइयों से शादी की थी, इसलिए उन्होंने इस परंपरा को सहजता से अपना लिया।
क्यों निभाई जाती है यह परंपरा?
अब सवाल ये उठता है कि आज के समय में भी ये प्रथा क्यों अपनाई और निभाई जाती है। जबकि आधुनिकता ने इस प्रथा को काफी हद तक खत्म कर दिया है, लेकिन कुछ क्षेत्रों में यह आज भी जीवित है। इसके पीछे मुख्य रूप से दो कारण माने जाते हैं जो नीचे बताए गए हैं।
1. खेती-बाड़ी और जमीन का बंटवारा
इस प्रथा का सबसे बड़ा कारण परिवार की जमीन को बंटने से बचाना है। अगर सभी भाई अलग-अलग शादी करेंगे, तो जमीन के टुकड़े हो जाएंगे। एक पत्नी होने से पूरा परिवार और संपत्ति एक सूत्र में बंधी रहती है।
2. महिलाओं की कमी
भारत के कुछ पुरुष प्रधान क्षेत्रों और तिब्बत जैसे इलाकों में महिलाओं की संख्या कम होने के कारण भी यह परंपरा पत्नी खोजने की कठिनाई का समाधान बनी रही है।
इस टॉपिक पर बन चुकी है फिल्म
साल 2003 में आई फिल्म 'मातृभूमि' में कन्या भ्रूण हत्या के बाद पैदा हुए संकट और एक महिला के कई पतियों की कहानी दिखाई गई थी। हालांकि वह फिल्म एक कड़वा सामाजिक संदेश देती थी, लेकिन उत्तराखंड के इस गांव में यह किसी अपराध की तरह नहीं, बल्कि एक धार्मिक और पारंपरिक विरासत के रूप में देखा जाता है।
क्या कहते हैं पति गुड्डू वर्मा?
राजो के पहले पति गुड्डू का कहना है कि, राजो हम सभी की पत्नी है, इसलिए उस पर हम सबका बराबर हक है। उसे अन्य महिलाओं की तुलना में ज्यादा प्यार और सुरक्षा मिलती है। यह परिवार आज भी एक ही कमरे में साथ सोता है और साथ खाना खाता है, जो बाहरी दुनिया के लिए भले ही अजीब हो, लेकिन उनके लिए यही उनकी खुशहाल संस्कृति है।



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