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Acharya Vidyasagar Maharaj : कौन थे आचार्य विद्यासागर महाराज? जिन्होंने ‘सल्लेखना’ से त्यागे प्राण
Acharya Vidyasagar Ji Maharaj News : छत्तीसगढ़ के डोंगरगढ़ स्थित चन्द्रगिरि तीर्थ में शनिवार (17 फरवरी) देर रात 2:35 बजे दिगंबर मुनि परंपरा के आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने अपना शरीर त्याग दिया।
उन्होंने आचार्य पद का त्याग करने के बाद 3 दिन का उपवास और अखंड मौन धारण करने के बाद देह त्याग दी। उनके निधन की खबर सुनते ही जैन समाज के लोगों की आखिरी दर्शन लेने के लिए भीड़ उमड़ पड़ी।
आइए जानते हैं कि कौन थे विद्यासागर महाराज और कैसे बने जैन धर्म सबसे बड़े संत-

बेलगाम में हुआ था जन्म
जैन संत विद्यासागर महाराज का जन्म देश की आजादी के पहले कर्नाटक के बेलगांव के सदलगा गांव में 10 अक्टूबर 1946 को शरद पूर्णिमा के दिन हुआ था। उनके 3 भाई और 2 बहनें है। तीन भाई में से 2 जैन मुनि तो तीसरे भाई धर्म के काम में लगे है। उनकी बहनों ने भी ब्रह्मचर्य लिया है। छत्तीसगढ़ के डोंगरगढ़ स्थित चंद्रगिरि तीर्थ में रहते हुए आचार्य विद्यासागर ने अपनी देह का त्याग किया।
कई भाषाओं के जानकार थे मुनिश्री
आचार्य विद्यासागर जी संस्कृत, प्राकृत सहित विभिन्न आधुनिक भाषाओं हिन्दी, मराठी और कन्नड़ में विशेषज्ञ स्तर का ज्ञान रखते थे। उन्होंने हिन्दी और संस्कृत में कई रचनाएं की हैं। सौ से अधिक शोधार्थियों ने उनके कार्य का मास्टर्स और डॉक्ट्रेट के लिए अध्ययन किया है। उनके कार्य में निरंजना शतक, भावना शतक, परीषह जाया शतक, सुनीति शतक और शरमाना शतक शामिल हैं। उन्होंने काव्य मूक माटी की भी रचना की है। विभिन्न संस्थानों में यह स्नातकोत्तर के हिन्दी पाठ्यक्रम में पढ़ाया जाता है।
आचार्य विद्यासागर जी के शिष्य मुनि क्षमासागर जी ने उन पर आत्मान्वेषी नामक जीवनी लिखी है। इस पुस्तक का अंग्रेजी अनुवाद भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित हो चुका है। मुनि प्रणम्यसागर जी ने उनके जीवन पर अनासक्त महायोगी नामक काव्य की रचना की है।
विद्याधर से आचार्य विद्यासागर महाराज तक का सफर
विद्यासागर ने त्याग, तपस्या और कठिन साधना के मार्ग पर चलते हुए महज 22 साल की उम्र में 30 जून 1968 को अजमेर में आचार्य ज्ञानसागर महाराज से मुनि दीक्षा ली। गुरुवर ने उन्हें उनके नाम विद्याधर से मुनि विद्यासागर की उपाधि दी और 22 नवंबर 1972 को अजमेर में ही गुरुवर ने आचार्य की उपाधि देकर उन्हें मुनि विद्यासागर से आचार्य विद्यासागर का दर्जा दिया। 1 जून 1973 में गुरुवर के समाधि लेने के बाद मुनि विद्यासागर आचार्य, श्री विद्यासागर जी महाराज की पदवी के साथ जैन समुदाय के संत बने। आचार्य विद्यासागर महाराज 500 से अधिक मुनियों को दे चुके हैं दीक्षा।
पूरा परिवार ले चुका है संन्यास
विद्यासागर जी के बड़े भाई अभी मुनि उत्कृष्ट सागर जी है। उनके घर के सभी लोग संन्यास ले चुके है। उनके भाई अनंतनाथ और शांतिनाथ ने आचार्य विद्यासागर जी से दीक्षा ग्रहण की और मुनि योगसागर जी और मुनि समयसागर जी के नाम से जाने जाते हैं। माता-पिता भी संन्यास ले चुके हैं।
अब कौन होगा अगला आचार्य?
संत ज्ञान सागर की तरह ही आचार्य विद्यासागर जी ने भी समाधि से 3 दिन पहले अपना आचार्य पद का त्याग करते हुए अगला आचार्य नियुक्त कर दिया था। उन्होंने आचार्य पद उनके पहले मुनि शिष्य निर्यापक श्रमण मुनि समयसागर को सौंप दिया है। विद्यासागर ने उन्हें योग्य समझा और 6 फरवरी के दिन ही आचार्य पद देने की घोषणा कर दी थी।



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