Latest Updates
-
कांवड़ यात्रा की शुरुआत कैसे हुई? जानिए कौन था पहला कांवड़िया, जिसने सबसे पहले चढ़ाया था शिवलिंग पर जल -
कलौंजी के तेल से बनाएं बालों को लंबा और घना, जानें इसे घर पर बनाने का तरीका -
देव आनंद के बेटे सुनील आनंद का हार्ट अटैक से निधन, जिस अस्पताल में पिता ने ली थी अंतिम सांस वहीं तोड़ा दम -
Guru Purnima 2026 Speech: गुरु पूर्णिमा पर दें ये सरल और दमदार भाषण, तालियों से गूंज उठेगा पूरा हॉल -
Guru Purnima 2026 Wishes: गुरु से ही ज्ञान...गुरु पूर्णिमा पर अपने गुरुजनों को भेजें ये खास शुभकामना संदेश -
World Nature Conservation Day 2026: क्यों मनाते हैं विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस? जानें इसका इतिहास और महत्व -
World Hepatitis Day 2026: हेपेटाइटिस क्या है? जानें इसके लक्षण, कारण, प्रकार और बचाव के उपाय -
CJP के बाद किसने शुरू की E20 जनता पार्टी? सोशल मीडिया पर जुड़े लाखों फॉलोअर्स, जानें क्या है मांग -
कौन हैं Indian Idol 16 की विनर ज्योतिर्मयी नायक? कैंसर मरीजों को देती थीं थेरेपी, अब है ये सपना -
Bank Holidays August 2026: अगस्त में 14 दिन बंद रहेंगे बैंक, यहां देखें छुट्टियों की पूरी लिस्ट
Scientific Reason : अपने हाथों से हमें क्यों नहीं होती है गुदगुदी, जानिए इसके पीछे का लॉजिक
Why Can't You Tickle Yourself Know Reason : जब कोई किसी को गुदगुदी करता है तो इंसान बहुत जोर से हंसने लगता है। मगर क्या आपने कभी गौर किया है कि किसी और के गुदगुदी करने से तो हम खूब हंसते हैं वहीं उसके विपरीत जब हम अपने ही हाथों से खुद को ही गुदगुदी करते हैं तो हमें बिल्कुल हंसी नहीं आती है। आपने कभी इस तरफ गौर किया है। नहीं, तो आज यहां जानते है कि इसके पीछे का लॉजिक।
ये होती है वजह
गुदगुदी को समझने के लिए मस्तिष्क के दो हिस्से जिम्मेदार होते हैं, पहला है सोमेटोसेंसरी कॉर्टेक्स (Somatosensory cortex)। ये हिस्सा स्पर्श को समझता है। दूसरा है एंटीरियर सिंगुलेट कॉर्टेक्स (Anterior cingulate cortex)। ये खुशी या किसी दिलचस्प अहसास को समझता है। जब हम खुद को गुदगुदी लगाने की कोशिश करते हैं तो मस्तिष्क का सेरिबेलम हिस्सा पहले ही इसका अंदाजा लगा लेता है और कॉर्टेक्स को इस बारे में सूचित कर देता है। ऐसे में गुदगुदी के लिए तैयार कॉर्टेक्स इसके लिए पहले ही सचेत हो जाते हैं और हमें गुदगुदी नहीं लगती।
क्या है गुदगुदी के पीछे का विज्ञान
वैज्ञानिकों के अनुसार गुदगुदी दो तरह से होती है। पहली है निसमेसिस। इसमें शरीर को हल्के से स्पर्श किया जाए तो उस जगह पर त्वचा की बाहरी परत जिसे एपिडर्मिस कहते हैं, ये नसों के जरिए दिमाग तक संदेश भेजता है। इससे हल्की खुजलाहट का अहसास होता है। दूसरी है गार्गालेसिस, इसके कारण पेट, बगल या गले पर छूने से इंसान बेहताशा हंसता है।
हम हंसते क्यों हैं?
गुदगुदी करना कभी कभी खतरे का भी संकेत होता है। हमारे शरीर के जिन हिस्सों में ज्यादा न्यूरॉन होते हैं जैसे पेट, और जांघ और पेट के बीच का हिस्सा, वो गुदगुदी को लेकर ज्यादा संवेदनशील होते हैं। जब दिमाग को लगता है कि गुदगुदी किया जाना खतरनाक नहीं है तो वह हंसकर तनाव दूर करता है। हंसने से तनाव भी कम होता है सेहत भी अच्छी होती है।
कई लोगों को बस गुदगुदी की सोचने भर से भी हंसी आती है. कभी-कभी गुदगुदी किए जाने से पहले भी हंसी आने लगती है! वैज्ञानिकों का मानना है कि खेल खेल में लड़ने से पहले भी दिमाग को ऐसे ही सिग्नल मिलते हैं। इसलिए तब भी हंसी आती है।

तनाव हंसी के रुप में बाहर निकलती है
खुद को गुदगुदी करने पर हम अपने दिमाग को पर्याप्त चेतावनी नहीं दे पाते हैं। गुदगुदी के हंसाने जितनी प्रभावशाली होने के लिए नेरफेनकित्सेल की जरूरत होती है। नेरफेनकित्सेल जर्मन में डर के रोमांच को कहा जाता है जो दूसरे द्वारा की गई गुदगुदी से होता है। गुदगुदी किए जाने पर हमारा दिमाग एक साथ खुशी और हल्का दर्द महसूस करता है। इससे दिमाग तनाव में आ जाता है। यह तनाव अनियंत्रित हंसी के रूप में बाहर आता है।



Click it and Unblock the Notifications