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Yuzvendra Chahal Divorce: कूलिंग पीरियड खत्म होने से पहले चहल-धनश्री ने लिया तलाक, जानें क्या है ये?
Yuzvendra Chahal-Dhanashree Divorce : भारतीय क्रिकेटर युजवेंद्र चहल और उनकी पत्नी धनश्री वर्मा कानूनी रूप से एक-दूसरे से अलग हो गए हैं। बांद्रा के फैमिली कोर्ट ने उनके तलाक को मंजूरी दे दी है। यह मामला काफी समय से चर्चा में था, क्योंकि दोनों ने शादी के महज डेढ़ साल बाद ही अलग होने का फैसला कर लिया था।
दोनों ने तलाक से पहले कूलिंग पीरियड की अवधि की छूट की मांग करे हुए जल्द ही तलाक ले लिया। आइए इसी बहाने जानते हैं कि आखिर डिवोर्स किन आधार पर होता है और कूलिंग पीरियड के क्या नियम हैं?

कैसे हुआ तलाक का फैसला?
युजवेंद्र चहल और धनश्री वर्मा ने दिसंबर 2020 में शादी की थी, लेकिन जून 2022 से वे अलग रह रहे थे। इसके बाद उन्होंने फैमिली कोर्ट में सहमति से तलाक (Mutual Divorce) की याचिका दायर की थी। आमतौर पर हिंदू विवाह अधिनियम के तहत सहमति से तलाक लेने के लिए पति-पत्नी को कम से कम एक साल तक अलग रहना पड़ता है और फिर अदालत में दूसरी बार अर्जी दाखिल करनी होती है। इसके अलावा, कोर्ट 6 महीने का कूलिंग-ऑफ पीरियड भी देता है, ताकि पति-पत्नी अपने फैसले पर दोबारा सोच सकें।
हालांकि, चहल और धनश्री ने कूलिंग-ऑफ पीरियड से छूट की मांग की थी, जिसे बांद्रा मजिस्ट्रेट कोर्ट ने पहले खारिज कर दिया था। इसके बाद बॉम्बे हाईकोर्ट में अपील की गई, जहां से उन्हें राहत मिली। हाईकोर्ट ने कहा कि कूलिंग-ऑफ पीरियड में छूट दी जा सकती है, क्योंकि दोनों लंबे समय से अलग रह रहे थे और साथ आने की कोई संभावना नहीं थी। साथ ही, चहल की आईपीएल में भागीदारी भी प्रभावित हो सकती थी।
क्या होता है कूलिंग-ऑफ पीरियड?
कूलिंग-ऑफ पीरियड का उद्देश्य पति-पत्नी को अपने रिश्ते को एक बार फिर से सोचने का समय देना होता है। यह समय इस बात को सुनिश्चित करता है कि कहीं वे गुस्से या भावनाओं में बहकर तलाक का फैसला तो नहीं ले रहे। हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13-बी(2) के तहत, सहमति से तलाक लेने वाले दंपत्ति को 6 महीने का कूलिंग-ऑफ पीरियड दिया जाता है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यदि पति-पत्नी लंबे समय से अलग रह रहे हैं और उनके रिश्ते में सुलह की कोई संभावना नहीं है, तो कोर्ट इस अवधि को माफ कर सकता है।
हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 क्या कहती है?
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 के तहत तलाक के कुछ वैध आधार होते हैं। यदि पति-पत्नी के बीच गंभीर विवाद हैं और वे एक साथ नहीं रह सकते, तो वे इस धारा के तहत तलाक की अर्जी दाखिल कर सकते हैं।
इस धारा के तहत तलाक के आधार निम्नलिखित हैं:
व्यभिचार (Adultery) - यदि पति या पत्नी में से कोई भी विवाह के दौरान किसी और के साथ शारीरिक संबंध बनाता है, तो यह तलाक का आधार बन सकता है।
क्रूरता (Cruelty) - यदि किसी एक पक्ष द्वारा मानसिक या शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है, तो इसे क्रूरता माना जाएगा और तलाक दिया जा सकता है।
परित्याग (Desertion) - यदि पति या पत्नी में से कोई एक बिना किसी उचित कारण के लगातार 2 साल तक दूसरे को छोड़कर चला जाता है, तो इसे परित्याग माना जाएगा।
धर्म परिवर्तन (Conversion) - यदि पति या पत्नी में से कोई एक हिंदू धर्म छोड़कर किसी अन्य धर्म को अपना लेता है, तो दूसरा पक्ष तलाक की अर्जी दाखिल कर सकता है।
मानसिक विकार (Mental Disorder) - यदि किसी भी पक्ष को गंभीर मानसिक बीमारी हो और उससे सामान्य जीवन प्रभावित हो रहा हो, तो तलाक लिया जा सकता है।
संक्रामक रोग (Leprosy or Venereal Disease) - यदि किसी व्यक्ति को कोई गंभीर संक्रामक बीमारी हो, तो दूसरा पक्ष तलाक मांग सकता है।
धारा 13 किन पर लागू होती है?
यह धारा केवल हिंदू धर्म के अनुयायियों पर लागू होती है, जिसमें हिंदू, बौद्ध, जैन और सिख शामिल हैं। अगर शादी हिंदू रीति-रिवाजों से हुई है, तो तलाक भी हिंदू विवाह अधिनियम के तहत ही होगा।
तलाक के लिए कितना समय लगता है?
सामान्य स्थिति में, सहमति से तलाक लेने के लिए पति-पत्नी को पहले कम से कम एक साल तक अलग रहना जरूरी होता है। इसके बाद पहली याचिका दायर की जाती है, और फिर 6 महीने के कूलिंग-ऑफ पीरियड के बाद दूसरी याचिका पर फैसला लिया जाता है।
हालांकि, यदि दोनों पूरी तरह से अलग रह रहे हों और उनके बीच सुलह की कोई संभावना न हो, तो कोर्ट कूलिंग-ऑफ पीरियड को माफ कर सकता है।



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