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Pitru Paksh Couple Rules : श्राद्ध में दंपत्तियों को क्यों नहीं बनाना चाहिए संबंध? क्या कहते है शास्त्र
Can Couple Intimate During Pitru Paksha 2025 : हिंदू धर्म में पितृ पक्ष का विशेष महत्व बताया गया है। भाद्रपद मास की पूर्णिमा से लेकर अश्विन अमावस्या तक चलने वाली यह अवधि पूर्वजों की आत्मा की शांति और मोक्ष के लिए समर्पित मानी जाती है। इस साल पितृ पक्ष 2 अक्टूबर तक चल रहा है। मान्यता है कि इन दिनों में पितरों का तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध करने से संतान को आशीर्वाद मिलता है और परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है।
धर्मग्रंथों में स्पष्ट उल्लेख है कि पितृ पक्ष के दौरान इंसान को संयमित जीवन जीना चाहिए। खान-पान से लेकर आचरण तक, इस अवधि में कई कठोर नियमों का पालन आवश्यक माना गया है। इन्हीं नियमों में एक प्रमुख नियम पति-पत्नी के बीच शारीरिक संबंध न बनाना भी है। आइए जानते हैं इसके पीछे की मान्यता और धार्मिक कारण।

पितरों का महत्व
हिंदू धर्म में पितृ देव तुल्य माने गए हैं। कहा जाता है कि मृत्यु के बाद पूर्वज देवताओं की श्रेणी में चले जाते हैं और पितृ पक्ष में वे अपनी संतान और वंशजों से मिलने आते हैं। इस अवधि में संतान का कर्तव्य होता है कि वह अपने पितरों का सम्मान करे और श्राद्ध, तर्पण जैसे कर्मकांडों के माध्यम से उनकी आत्मा की शांति सुनिश्चित करे।
गरुड़ पुराण में भी श्राद्ध का महत्व विस्तार से बताया गया है। इसमें कहा गया है कि अगर पितरों को तृप्ति और शांति नहीं मिलती है, तो संतान के जीवन में सुख-शांति भी स्थायी नहीं रहती। ऐसे परिवारों पर पितृ दोष का प्रभाव पड़ता है, जिससे तरक्की और समृद्धि में बाधाएं आती हैं।
पितृ पक्ष में ब्रह्मचर्य का पालन क्यों?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पितृ पक्ष में ऐसा कोई भी कार्य नहीं करना चाहिए जिससे आने वाले पितरों का अपमान हो। इसी कारण इस अवधि में ब्रह्मचर्य का पालन विशेष रूप से आवश्यक माना गया है। शारीरिक संबंध बनाना पितरों के प्रति असम्मान की श्रेणी में आता है।
शास्त्रों का मानना है कि इस समय दंपति अगर अपनी इंद्रियों पर संयम रखते हैं तो उन्हें अधिक पुण्य की प्राप्ति होती है। यह आत्मिक शुद्धि का समय होता है और इसमें कामुकता से दूरी बनाए रखना आवश्यक है।
गर्भधारण से जुड़ी मान्यता
धर्म शास्त्रों में एक और कारण बताया गया है कि पितृ पक्ष के दौरान अगर दंपति के बीच शारीरिक संबंध से गर्भधारण हो जाता है, तो होने वाली संतान के स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। कहा जाता है कि इस समय गर्भ धारण करने वाली संतान को शारीरिक या मानसिक समस्याएं झेलनी पड़ सकती हैं। कई जगह यह भी माना जाता है कि इस अवधि में जन्म लेने वाली संतान विकलांग या बीमार हो सकती है। इसी वजह से इस समय यौन संबंध बनाने से परहेज करने की सख्त सलाह दी जाती है।
शास्त्रों में क्या है वर्णित
पवित्र श्रीमद्भगवद गीता के अध्याय 16, श्लोक 23-24 में भी स्पष्ट कहा गया है कि जो व्यक्ति शास्त्रों में बताए गए नियमों को त्यागकर अपनी मनमानी करता है, वह न सुख प्राप्त कर सकता है, न परमगति, और न ही किसी कार्य में सफलता। गीता में अर्जुन से कहा गया है कि कर्तव्य और अकर्तव्य की पहचान के लिए केवल शास्त्र ही प्रमाण हैं। इसलिए शास्त्रों द्वारा निषेध किए गए कर्मों का त्याग करना ही श्रेष्ठ है। इस दृष्टि से देखा जाए तो पितृ पक्ष में ब्रह्मचर्य का पालन करना और शारीरिक संबंध से दूर रहना शास्त्र सम्मत आचरण है।



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