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Separation Vs Divorce : साइना नेहवाल और कश्यप हुए अलग, तलाक और सेपरेशन में फर्क जानें
Separation vs Divorce : भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ी साइना नेहवाल इन दिनों अपनी निजी जिंदगी को लेकर चर्चा में हैं। हरियाणा के हिसार में जन्मी साइना ने इंस्टाग्राम पर बताया कि उन्होंने और उनके पति पारुपल्ली कश्यप ने आपसी सहमति से अलग होने का फैसला किया है। हालांकि उन्होंने तलाक का ज़िक्र नहीं किया, लेकिन कई मीडिया रिपोर्ट्स में उनके तलाक की खबरें सामने आ रही हैं। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि सेपरेशन (अलगाव) और तलाक (डिवोर्स) दोनों एक जैसे नहीं होते।
देवकीनंदन व्यास, अधिवक्ता, उच्च न्यायालय, जोधपुर खंडपीठ ने बताया कि भारत में कई लोग इन दोनों को एक जैसा मान लेते हैं, जबकि इनका कानूनी मतलब अलग होता है। तलाक लेने पर पति-पत्नी का रिश्ता पूरी तरह खत्म हो जाता है, जबकि ज्यूडिशियल सेपरेशन में वे सिर्फ अलग रहते हैं, लेकिन कानूनी रूप से पति-पत्नी ही बने रहते हैं। ऐसे मामलों में सही जानकारी का होना बहुत ज़रूरी है ताकि कोई भी बिना समझे बड़ा फैसला न ले।

क्या होता है ज्यूडिशियल सेपरेशन?
ज्यूडिशियल सेपरेशन (Judicial Separation) का मतलब होता है कि कोर्ट के आदेश से पति-पत्नी एक-दूसरे से अलग रह सकते हैं, लेकिन वे कानूनी रूप से अभी भी पति-पत्नी ही बने रहते हैं। यह एक तरह का 'कूलिंग ऑफ पीरियड' होता है जिसमें दोनों को सोचने का समय मिलता है कि वे भविष्य में साथ रहना चाहते हैं या नहीं।
भारत में ज्यूडिशियल सेपरेशन के नियम
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955: इस अधिनियम के सेक्शन 10 में ज्यूडिशियल सेपरेशन का प्रावधान है।
स्पेशल मैरिज एक्ट, 1954: इस कानून में भी ज्यूडिशियल सेपरेशन की अनुमति दी गई है।
ईसाई समुदाय के लिए Indian Divorce Act, 1869 में इससे संबंधित प्रावधान मौजूद हैं।
मुस्लिम कानून में तलाक की प्रक्रिया अलग होती है और ज्यूडिशियल सेपरेशन जैसा स्पष्ट नियम नहीं है, लेकिन कुछ मामलों में कोर्ट की अनुमति से पति-पत्नी अलग रह सकते हैं।
कितना अलग है सेपरेशन से डिवोर्स?
हिंदू मैरिज एक्ट के सेक्शन 13B(2) के तहत, जब पति-पत्नी आपसी सहमति से तलाक लेना चाहते हैं, तो उन्हें तलाक की अर्जी दायर करने की तारीख से कम से कम 6 महीने और अधिकतम 18 महीने का इंतजार करना होता है। इस समय को Cooling Period कहा जाता है। इस दौरान दोनों पक्ष अपना फैसला बदल सकते हैं और अर्जी वापस ले सकते हैं। अगर ऐसा नहीं होता, तो वेटिंग पीरियड के बाद कोर्ट सुनवाई कर तलाक को मंजूरी दे सकता है।

तलाक और सेपरेशन में अंतर
तलाक (Divorce) और ज्यूडिशियल सेपरेशन (Judicial Separation) दोनों ही पति-पत्नी के बीच बढ़े तनाव के बाद अपनाए जाने वाले कानूनी तरीके हैं, लेकिन इन दोनों में बड़ा अंतर होता है। तलाक का मतलब होता है कि पति और पत्नी का रिश्ता पूरी तरह से खत्म हो जाता है। तलाक के बाद वे कानूनी रूप से पति-पत्नी नहीं रहते और एक-दूसरे के साथ रहने की कोई बाध्यता नहीं होती। इसके बाद दोनों अपनी-अपनी जिंदगी में आगे बढ़ सकते हैं और दोबारा शादी भी कर सकते हैं। तलाक का मतलब होता है कि दोनों ने हमेशा के लिए अलग होने का फैसला ले लिया है।
ज्यूडिशियल सेपरेशन का मतलब है कि कोर्ट की अनुमति से पति-पत्नी कुछ समय के लिए अलग रह सकते हैं, लेकिन कानूनी रूप से उनका रिश्ता बना रहता है। वे अब भी पति-पत्नी माने जाते हैं और इस दौरान वे किसी और से शादी नहीं कर सकते। इस प्रक्रिया का मकसद दोनों को सोचने और रिश्ते को सुधारने का एक मौका देना होता है। इसे एक तरह का Cooling-Off Period भी कहा जाता है।
इन स्थितियों में पति-पत्नी ले सकते हैं Separation?
जब पति-पत्नी के बीच झगड़े, तनाव और दूरियां इतनी बढ़ जाती हैं कि साथ रहना मुश्किल हो जाए, लेकिन वे तलाक नहीं लेना चाहते, तब वे ज्यूडिशियल सेपरेशन के लिए कोर्ट में याचिका दायर कर सकते हैं। यह एक कानूनी तरीका है जिसमें कोर्ट की अनुमति से दोनों कुछ समय के लिए अलग रह सकते हैं, ताकि वे सोच-समझकर आगे का फैसला ले सकें।
इन स्थितियों में मिल सकती है ज्यूडिशियल सेपरेशन की अनुमति-
- अगर पति या पत्नी शारीरिक या मानसिक रूप से प्रताड़ित करता/करती हो
- किसी एक का एक्सट्रा मैरिटल अफेयर यानी विवाहेतर संबंध हो
- पति या पत्नी एक-दूसरे को बिना कारण त्याग दें या छोड़कर चले जाएं
- किसी एक ने धर्म परिवर्तन कर लिया हो
- अगर किसी को गंभीर मानसिक बीमारी हो
- शादी के बाद कोई भी वैवाहिक जिम्मेदारियां न निभा रहा हो, जैसे साथ न रहना, खर्च न उठाना आदि
- इनमें से कोई भी वजह हो, तो पति-पत्नी कोर्ट में जाकर ज्यूडिशियल सेपरेशन की अर्जी दे सकते हैं।



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