स्ट्रोक के बाद रोगी की देखभाल कैसे करें? डॉक्टर से जानें किन बातों का रखना चाहिए ख्याल

Post Stroke Care Tips: स्ट्रोक एक ऐसी गंभीर स्थिति है, जो पलभर में किसी व्यक्ति की जिंदगी बदल सकती है। इसे ब्रेन अटैक भी कहा जाता है। स्ट्रोक तब होता है, जब मस्तिष्क को खून की सही सप्लाई नहीं मिलती या दिमाग में कोई रक्त वाहिका फट जाती है। इसके कारण मस्तिष्क के कुछ हिस्से तक पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाती, और उस हिस्से की कोशिकाएं मरने लगती हैं। अगर समय पर इलाज न मिले, तो स्ट्रोक स्थायी विकलांगता या जानलेवा साबित हो सकता है। लेकिन अच्छी बात यह है कि समय पर इलाज और सही देखभाल से मरीज फिर से सामान्य जीवन जी सकता है। स्ट्रोक आने के बाद मरीज की सही देखभाल से न सिर्फ मरीज की रिकवरी जल्दी और बेहतर तरीके से होती है, बल्कि दोबारा स्ट्रोक आने का खतरा भी काफी हद तक कम हो जाता है। हर साल स्ट्रोक के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से 29 अक्टूबर को विश्व स्ट्रोक दिवस (World Stroke Day 2025) मनाया जाता है। आइए, आज इसी मौके पर डॉ उत्कर्ष भगत, सीनियर कंसल्टेंट एवं निदेशक - न्यूरोसर्जरी, नारायणा हॉस्पिटल गुरुग्राम,से जानते हैं कि स्ट्रोक के बाद मरीज की देखभाल कैसे करें?

Post Stroke Recovery Tips

स्ट्रोक के बाद शुरुआती दिन

आम तौर पर स्ट्रोक के बाद मस्तिष्क खुद को ठीक करने की कोशिश करता है। इस दौरान शरीर के प्रभावित हिस्से में कमजोरी, बोलने में परेशानी, याददाश्त में कमी या मूड बदलने जैसी समस्याएं हो सकती हैं। ऐसे में शुरुआती कुछ दिन मरीज को स्थिर रखने और किसी तरह की जटिलता जैसे संक्रमण या दोबारा स्ट्रोक से बचाने में बिताए जाते हैं।

स्ट्रोक के बाद रिहैबिलिटेशन

एक बार स्थिति के नियंत्रण में आने के बाद ही रिहैबिलिटेशन यानी पुनर्वास का असल काम शुरू होता है। इसमें कई विशेषज्ञों की टीम मिलकर काम करती है: फिजियोथेरेपिस्ट शरीर की ताकत और मूवमेंट पर ध्यान देते हैं, ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट मरीज को रोजमर्रा के काम जैसे कपड़े पहनना, खाना खाना या लिखना फिर से सिखाते हैं, और स्पीच थेरेपिस्ट उन लोगों की मदद करते हैं जिन्हें बोलने या निगलने में दिक्कत होती है। धीरे-धीरे, रोज़ के छोटे-छोटे अभ्यासों से मरीज अपने हाथ-पैर हिलाने, बोलने या चलने की क्षमता वापस पा सकते हैं।

मनोवैज्ञानिक सहारा भी है आवश्यक

स्ट्रोक के बाद कई बार मनोवैज्ञानिक देखभाल भी बहुत जरूरी होती है। कई बार मरीज अचानक हुए बदलाव से परेशान या उदास हो जाते हैं। ऐसे में परिवार का साथ, सकारात्मक माहौल और ज़रूरत पड़ने पर काउंसलिंग बहुत मददगार साबित होती है। मानसिक ताकत ही शारीरिक सुधार को गति देती है।

परिवार की भूमिका

इस पूरी प्रक्रिया में परिवार की भूमिका सबसे अहम होती है। मरीज को भावनात्मक सहारा देना, उसे रोज़ के अभ्यासों में मदद करना और समय पर दवा देना परिवार के सहयोग से ही संभव होता है। देखभाल करने वालों को यह समझना चाहिए कि मरीज को सबसे ज्यादा जरूरत उनके धैर्य और प्रोत्साहन की है।

स्ट्रोक के बाद डाइट और लाइफस्टाइल

डाइट यानी भोजन का ध्यान रखना भी उतना ही जरूरी है। स्ट्रोक के बाद हल्का, कम नमक वाला, पौष्टिक भोजन शरीर को स्वस्थ रखने के साथ-साथ दोबारा स्ट्रोक के खतरे को कम करता है। ब्लड प्रेशर और शुगर का नियंत्रण, धूम्रपान से दूरी और नियमित दवाओं का सेवन रिकवरी के लिए बेहद जरूरी हैं।

नई तकनीकें

आज तकनीक ने भी स्ट्रोक के बाद की देखभाल को आसान बना दिया है। अब रोबोटिक थेरेपी, वर्चुअल रिहैबिलिटेशन और ऑनलाइन फिजियो सेशन जैसी सुविधाओं से मरीज घर बैठे इलाज जारी रख सकते हैं। इससे उन्हें नियमित अभ्यास का मौका मिलता है और सुधार की प्रक्रिया तेज होती है।

स्ट्रोक के बाद की जिंदगी कठिन जरूर होती है, लेकिन नामुमकिन नहीं। थोड़े धैर्य, निरंतर अभ्यास और सही मार्गदर्शन से हर मरीज एक नई शुरुआत कर सकता है।

Disclaimer: इस आर्टिकल में दी गई जानकारी सिर्फ सामान्य जानकारी और शैक्षणिक उद्देश्य के लिए है। यह किसी भी तरह की मेडिकल सलाह, जांच या इलाज का विकल्प नहीं है। किसी भी स्वास्थ्य से जुड़ी समस्या या सवाल के लिए हमेशा अपने डॉक्टर या किसी योग्य व अनुभवी स्‍वास्‍थ्‍य प्रदात्ता से सलाह लें।

Story first published: Wednesday, October 29, 2025, 15:58 [IST]
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