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बारिश फिर लायी जापानी बुखार

इस बिमारी और सरकार के ढुलमुल रवैये के चलते पिछले 28 सालों से अकेले पूर्वांचल में 10 हजार से ज्यादा मासूम काल के गाल में समा गये, लेकिन सरकार और तंत्र सबका रवैया ठिक वैसे ही जैसे कि, जब कुशीनगर जिले में इसका पहला मरीज पाया गया था। जेई जो कि धीरे-धीरे समूचे पूर्वांचल के 41 जिलों सहित उत्तर प्रदेश के सिमावर्ती राज्य बिहार में प्रवेश कर चुकी है, और अपनी प्रवृत्ति की गुलाम बन मौत का तांडव करती रहती है। वहीं देश की सरकारें मौत के बडे़ तमाशे होने पर अपने मातहतो व कर्मचारियों का तबादला कर चुप्पी साध लेती है।
जेई दुनिया भर में अकेले भारत में ही नहीं है इस बिमारी की शुरूआत सबसे पहले जापान में सन 1870 में हुई थी उस समय यह बिमारी जापान में केवल गर्मियों में ही पनपती थी तो इस वहां उस समय समर इंसेफलाटिस भी कहा जाता था। उसके बाद इस बिमारी ने दुनिया भर में अपना पहला रौद्र रूप दिखाया और अकेले जापान में 6,125 मामले प्रकाश में आये जिनमें से 3,797 मामलों में लोगों को मौत मिली।
इस बिमारी का कहर समय के साथ बढता गया और फिर सन 1940 में यह कोरिया और चीन को भी अपने चपेट में ले लिया और अस्सी के दशक में इसने भारत में कदम रखा। भारत में इस बिमारी ने अपना ठिकाना चुना पूर्वांचल के कुशीनगर जिले के होलिया गांव को जहां 1983 में पहली बार जापानी बुखार का मरीज मिला था। तबसे लेकर आज तक इस बिमारी ने पूर्वांल में दस हजार से ज्यादा मासूमों को अपना शिकार बनाया है।
देश में स्वास्थ, सुरक्षा और शिक्षा के लिए वर्तमान केन्द्र सरकार सबसे ज्यादा धन खर्च करती है और केन्द्र सरकार इन्ही तीनों को महत्वपूर्ण भी मानती है लेकिन बावजूद इसके हर साल इस बिमारी से होने वाली मौतों में ईजाफा हो रहा है। पिछले साल अकेले इस बिमारी ने पूर्वांचल में 316 मासूमों को मौत दे दी, और लगभग 3,022 मरीजों के मामले सामने आये। इस बिमारी के रोकथाम के लिए कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी भी तीन बार पूर्वांचल की तरफ रूख किये लेकिन मौत के आंकडों पर इनका कोई असर नहीं पड़ा।
जहां पुरे देश में मानसून के आने के बाद लोगों में आने वाले सावन को लेकर खुशियां होती है वहीं पूर्वांचल के लोगों में एक अनजाने मौत का खौफ घर कर लेता है। यह बिमारी बरसात के ही समय अपने प्रचंड रूप में होती है और जैसे जैसे बारीश बढती जाती है बिमार मासूमों की जमात गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कालेज और वाराणसी के बीएचयू में बढ़ने लगती है। अस्पतालों में मां की चिख और डायन इंसेफलाईटिस का कहर ही देखने को मिलता है।
जेई को लेकर सरकार की नाकाम होती योजनाएं
यू तो सरकार देश में हर बिमारी के शुरू होते ही बहुत ही तत्परता से योजनाओं का शुभारंभ कर देती है लेकिन उन योजनाओं की जमीनी हकीकत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले 28 सालों में जेई के मौत के आंकड़ो पर अंकुश लगा पाना तो दूर सरकार उसे स्थिर करने में भी नाकाम है। आपकों बताते चले कि बीते वर्ष सरकार ने पूर्वांचल के पांच जिलों गोरखपुर, कुशीनगर, सिद्वार्थनगर, महाराजगंज, देवरिया में इस बिमारी के समूल नाश के लिए टिकाकारण अभियान चलाया।
इस टिकाकरण अभियान के शुरू होने से पहले राज्य सरकार में तत्कालिन स्वास्थ राज्यमंत्री रहे अनंत मिश्रा व स्वास्थ महानिदेशक ने कुशीनगर जिले के लोटस निक्को होटल में आठ जिलों के मुख्य चिकित्सा अधिक्षकों व अन्य स्वास्थ कर्मचारियों के साथ बैठक की। इस बाबत कई सीएमओ को उनके कार्यो के प्रति उदासिनता के चलते फटकार भी लगायी गयी। उसके बाद टिकाकरण अभियान को शुरू करने के आदेश दिये गये।
सरकार की ईमानदारी और कर्मचारियों की तत्पराता देखिये कि वो टिकाकरण अभियान शुरू होने से पहले दो बार निरस्त किया गया। इसके अलंवा वैक्सीन के डिलीवरी में देरी होने के कारण लाखों रूपये के वैक्सीन गोरखपुर डीपों में ही एक्सपायर हो गये। सरकारी काम था सरक कर ही चलना था और जब तक सरकार दूबारा मिटींग करती नयी योजना बनाती तब तक एक बार फिर बरसात में पूर्वांचल इंसेफलाटिस की चपेट में था, और मासूमों की मौत का सिलसिला शुरू हो गया।
केवल पूर्वांचल में ही नहीं जेई
भारत भर में केवल पूर्वांचल ही एक क्षेत्र ऐसा नहीं है जहां जापानी बुखार का कहर है। यदि पुरे भारत के आंकड़ो पर गौर करे तो अकेले सन 2010 में पूर्वांचल में 103 मौते, असम में 274 मामले सामने आये जिनमे से 69 की मौत, तमिलनाडू में 153 मामले, गोवा में 35 व कर्नाटका में 18 जापानी बुखार के मामले प्रकाश में आयें है। यदि समय रहते सरकार इस बिमारी के प्रति सजग नहीं होती है तो देश का भविष्य ही अधर में होगा क्योकि यह बिमारी मासूमों को ही अपना पहला निशाना बनाती है।
जेई के लक्षण और फैलने का कारण
जापानी बुखार को लगभग एक हफ्ते के अन्दर सही चिकित्सकीय परिक्षण से आसानी से पहचाना जा सकता है। यह बिमारी मुख्य रूप से सूअर, और मक्ष्छरों से फैलती है। इंसेफलाईटिस के वायरस सूअर के शरीर में एक परिजीवी के तौर पर रहते है और मच्छरों के माध्यम से यह फैलते है। आबादी वाले क्षेत्रों में फैली गंदगियों, नालियों या किसी जानवर के मरे होने पर इस बिमारी के सक्रिय होने का डर होता है। यह बिमारी 2 से 6 साल तक के बच्चों में आसानी से हो जाती है। लक्षण शरीर में बुखार, सिर दर्द, शरीर में कंपकपी, कमजोरी और उल्टियां।
;Disclaimer: इस आर्टिकल में दी गई जानकारी सिर्फ सामान्य जानकारी और शैक्षणिक उद्देश्य के लिए है। यह किसी भी तरह की मेडिकल सलाह, जांच या इलाज का विकल्प नहीं है। किसी भी स्वास्थ्य से जुड़ी समस्या या सवाल के लिए हमेशा अपने डॉक्टर या किसी योग्य व अनुभवी स्वास्थ्य प्रदात्ता से सलाह लें।



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