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अलजाईमर्स दिवस: अलजाइमर्स का स्थायी इलाज नहीं
देश-दुनिया के तमाम अस्पतालों में 21 सितंबर को अलजाईमर्स दिवस मनाया जा रहा है। ऐसे में इस बीमारी पर चर्चा जरूरी है और लोगों को जागरूक करना भी।
लेख- अलजाइमर्स यानि भूलने की बीमारी का सबसे साधारण रूप है। वर्तमान समय में यह बीमारी लोगों को तेजी से अपनी गिरफ्त में लेती जा रही है। याददाश्त कम होने के साथ-साथ मरीज के व्यवहार में कई अन्य परिवर्तन भी देखने को मिलते हैं। इस बीमारी का स्थायी इलाज नहीं है, लेकिन मधुमेह, उच्च रक्तचाप को नियंत्रित करके इस रोग पर काफी हद तक काबू पाया जा सकता है।

खानपान में वसायुक्त भोजन का परहेज और विटामिन युक्त भोजन की मात्रा बढ़ाकर इस बीमारी को कुछ हद तक दूर रखा जा सकता है। इस बीमारी से घबराना नहीं चाहिए। इसके कोई लक्षण मिले तो तुरंत डॉक्टर के पास जाना चाहिए। महिलाओं में जिंदगी के पुराने पलों को बुढ़ापे में सोचने की आदत ज्यादा होती है। यही वजह है कि वे इस बीमारी की ज्यादा शिकार होती हैं।
इस बीमारी के मरीजों की देखरेख में खास ध्यान रखना पड़ता है। जहां उन्हें रखा जाए कमरा खुला और हवादार हो, दीवार पर बड़े अंकों के कैलेंडर टंगे हों। परिजनों के फोटो भी बड़े फ्रेम कर लगाए जाएं। इससे मरीज का मस्तिष्क क्रियाशील रहता है। रोगियों की दिनचर्या भी भी विशेष ध्यान रखना चाहिए। इसमें दैनिक क्रियाएं, समय पर नहाना आदि मुख्य हैं। इसके अलावा रोगी से बात जरूर करें, जैसे उसे खाना देते समय ये जरूर बताएं कि वो क्या खा रहे हैं। इसके अलावा रोगी की सुरक्षा बहुत जरूरी है। ध्यान रखें कि उसके पास पहचान पत्र जरूर हो। रोगी से संवाद बनाए रखकर उसे पुरानी बातें याद दिलाई जा सकती हैं। उन्होंने बताया कि अलजाइमर्स बीमारी का कोई इलाज नहीं है, लेकिन जागरूकता से इस बीमारी से बचा जा सकता है। प्राकृतिक एंटी ऑक्सीडेंट्स युक्त भोजन लेकर इस बीमारी से बचा जा सक।
अलजाइमर्स एक बढ़ता रहने वाला और पूरी तरह से ठीक न होने वाली बीमारी है। जो कि धीरे-धीरे स्मरण शक्ति, सोचने की क्षमता को नष्टï कर देता है। इस रोग से ६५ वर्ष से ऊपर की १० फीसदी आबादी प्रभावित है। अग हम ६५ वर्ष से १० साल जैसे-जैसे ऊपर जाते हैं। इस रोग का प्रसार दोगुना हो जाता है। इस बीमारी से संबंधित मरीज का सबसे भयंकर व्यवहार बेवजह घूमने निकल जाना है। ऐसे मरीज बहुत जल्दी खो जाते हैं। इन्हें खोजने में देरी की वजह से दुष्परिणाम बढ़ जाते हैं। इसलिए जरूरी है कि बीमारी को समय पर ही पहचाना जा सके।
लेखक परिचय- डा. आर के गर्ग, लखनऊ की किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी के न्यूरोलॉजी विभाग के विभागाध्यक्ष हैं।
Disclaimer: इस आर्टिकल में दी गई जानकारी सिर्फ सामान्य जानकारी और शैक्षणिक उद्देश्य के लिए है। यह किसी भी तरह की मेडिकल सलाह, जांच या इलाज का विकल्प नहीं है। किसी भी स्वास्थ्य से जुड़ी समस्या या सवाल के लिए हमेशा अपने डॉक्टर या किसी योग्य व अनुभवी स्वास्थ्य प्रदात्ता से सलाह लें।



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