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जानें कैसे न्यूज का एडिक्शन फिजिकल और मेंटल हेल्थ को पहुंचा सकता है नुकसान
क्या आप न्यूज देखने के शौकीन है, क्या ऑफिस में काम करते समय भी आप हैडफोन में न्यूज सुनते रहते है। तो बतादें कि आपकी ये आदत या यूं कहें रूचि आपकी फिजिकल और मेंटल हेल्थ पर बुरा असर ड़ाल सकती है। जानिए कैसे:

दरअसल एक स्टडी में ये बात सामने आई है कि, जिन लोगों में लगातार न्यूज चैक करने की जुनूनी इच्छा होती है, उनमें तनाव, चिंता और शारीरिक बीमारी से पीड़ित होने की संभावना अधिक होती है। देखा जाए तो पिछले दो सालों के दौरान, हम चिंताजनक वैश्विक घटनाओं की एक श्रृंखला से गुजरे हैं, जिसमें कोविड महामारी से लेकर रूस का यूक्रेन पर हमला, बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन, सामूहिक गोलीबारी और विनाशकारी जंगल की आग जैसी घटनाएं शामिल हैं। कई लोगों बुरी खबरें पढ़ने या सुनने के बाद शक्तिहीन और मेंटली परेशान महसूस कर सकते है।

वहीं, दूसरों के लिए, लगातार विकसित होने वाली घटनाओं के 24 घंटे के न्यूज साइकल के संपर्क में आने से मेंटल और फिजिकल हेल्थ पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। एक्सपर्ट की मानें तो न्यूज के जरिए सामने आने वाली इन घटनाओं को देखने से कुछ लोगों में लगातार हाई अलर्ट की स्थिति पैदा हो सकती है। "इन व्यक्तियों के लिए, एक गलत साइकल विकसित हो सकता है, जिसमें वे बदलाव लाने की बजाय, वे उसकी तरफ और ज्यादा आकर्षित होते जाते हैं, ऐसे में वे न्यूज पर सबसे ज्यादा पर ध्यान देते हैं और अपने इमोशनल डिस्ट्रेस को कम करने के लिए चौबीसों घंटे न्यूज अपडेट जांचते रहते हैं। लेकिन इससे उन्हें कोई मदद नहीं मिलती, बल्कि वे जितनी ज्यादा न्यूज चैक करते हैं, उतनी ही ये आदत उनके जीवन के अन्य पहलुओं में हस्तक्षेप करना शुरू कर देती है।"

न्यूज देखने की इस आदत पर हुए सर्वे में लोगों से लोगों से पूछा गया कि क्या वे खबरों में इतना लीन हो जाते है कि अपने आस-पास की दुनिया को भूल जाते है", " क्या उनके दिमाग में अक्सर खबरों से जुड़े विचार चलते रहते है ", तो सभी का जवाब हां ही था। उनका ये मानना था कि न्यूज पढ़ना या देखना बंद करना मुश्किल है", और उन्होंने इस बात से भी इंकार नहीं किया कि जब वे न्यूज पढ़ने या देखने में व्यस्त होते है तो वे अपने काम पर ध्यान नहीं दे पाते। उनसे ये भी पूछा गया कि अपनी इस आदत के कारण वे कितनी बार तनाव और चिंता की भावनाओं के साथ-साथ थकान, शारीरिक दर्द, एकाग्रता में कमी और गैस्ट्रोंइंटेस्टाइनल संबंधी समस्याओं का अनुभव करते हैं। और आपको ये बात जानकार हैरानी होगी कि सर्वे में शामिल 16.5% लोगों ने 'गंभीर रूप से समस्याग्रस्त' होने के संकेत दिखाए। दरअसल ऐसे व्यक्ति अक्सर समाचारों में इतने डूबे रहते हैं कि न्यूज में बताई जाने वाली रिपोर्टस उनके निजी विचारों पर हावी हो जाती हैं, और इस कारण वे परिवार और दोस्तों के साथ समय नहीं बिता पाते हैं, काम से फोकस हटाने के साथ ही ये बेचैनी और नींद ना ले पाने जैसी दिक्कतें भी खड़ी कर सकता है।

इस समस्या पर कैसे काबू पाया जा सकता है
देखा जाए तो सिर्फ टीआरपी बढ़ाने की होड़ में मीडिया वाले सनसनीखेज खबरें चलाते है। ताकि देखने वाले के दिमाग में उस न्यूज के बारे में जानने की उत्सुकता बढ़ें। लेकिन कमशिर्यल प्रेशर के बीच न्यूज मीडिया का ये कदम ना केवल स्वस्थ लोकतंत्र को बनाए रखने के लक्ष्य के लिए हानिकारक हैं, बल्कि वे व्यक्तियों के स्वास्थ्य के लिए भी हानिकारक हो सकते हैं। एक्सपर्टस की राय कहती है कि, लोगों को न्यूज के साथ एक हेल्दी रिलेशन मेंटेन करने में मदद करने के लिए केंद्रित मीडिया साक्षरता अभियानों की आवश्यकता है। ज्यादातर मामलों में, किसी भी चीज की लत और अनिवार्य व्यवहारों का ट्रीटमेंट समस्या बढ़ाने वाले व्यवहार को पूरी तरह से खत्म करने पर केंद्रित होता है, क्योंकि व्यवहार पर संयम पाना मुश्किल हो सकता है। तो अगर किसी व्यक्ति को ऐसा लग रहा है कि ज्यादा न्यूज देखने पर उसकी मेंटल हेल्थ पर नैगेटिव इफेक्ट पड़ रहा है तो वह न्यूज देखना बंद या कम कर सकता है या फिर उसे ज्यादा पर्सनली ना लेने का फैसला कर सकता हैं। ताकि वह जिंदगी के सभी मोर्चो पर हेल्दी माइंडसेट के साथ काम कर सकें।
Disclaimer: इस आर्टिकल में दी गई जानकारी सिर्फ सामान्य जानकारी और शैक्षणिक उद्देश्य के लिए है। यह किसी भी तरह की मेडिकल सलाह, जांच या इलाज का विकल्प नहीं है। किसी भी स्वास्थ्य से जुड़ी समस्या या सवाल के लिए हमेशा अपने डॉक्टर या किसी योग्य व अनुभवी स्वास्थ्य प्रदात्ता से सलाह लें।



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