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पहाड़ों में चढ़ते वक्त हो सकती है एक्यूट माउंटेन सिकनेस की प्रॉब्लम, जानें इसके लक्षण और बचाव के तरीके
उत्तराखंड में चारधाम यात्रा शुरु होने वाली है, जिसमें देशभर से श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचेंगे। इसके अलावा समर वैकेशन में गर्म मौसम से बेहाल लोग ठंडे और पर्वतीय स्थलों पर वैकेशन मनाने पहुंच रहे हैं। देखा जाए तो मैदानी इलाकों की तुलना में पहाड़ों पर यात्रा करना काफी चुनौती भरा होता है।
खासकर उनके लिए, जो ज्यादा चढ़ाई के आदी नहीं हैं। ऐसे में उन्हें कई तरह की शारीरिक एवं मानसिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है। इसके अलावा ज्यादा ऊंचाई पर जाने पर हाई एल्टीट्यूड या एक्यूट माउंटेन सिकनेस की समस्याएं हो सकती है। ऐसी समस्याएं कभी-कभी गंभीर रूप धारण कर लेती है। चारधाम की यात्रा करते हुए या फिर माउंटेन पर हाइकिंग करते समय अगर सावधानी बरती जाए तो काफी हद तक इन परेशानियों से बचा जा सकता है। आइए जानते है एक्यूट माउंटेन सिकनेट क्या होता है और इससे कैसे बचा जाएं।

एक्यूट माउंटेन सिकनेस क्या होता है?
ऊंचाई की बीमारी, जिसे एक्यूट माउंटेन सिकनेस भी कहा जाता है, तब होती है जब आपका शरीर कम दबाव, कम ऑक्सीजन वाले वातावरण के अनुकूल होने में असमर्थ होता है - आमतौर पर समुद्र तल से लगभग 8,000 फीट ऊपर ऊंचाई पर जाने में ये समस्याएं होती है। इससे सांस लेने में समस्या और कई अन्य लक्षण हो सकते हैं जो बहुत हल्के से लेकर जानलेवा तक हो सकते हैं।

एक्यूट माउंटेन सिकनेस की वजह?
अधिक ऊंचाई पर जानें पर ऑक्सीजन का लेवल कम हो जाता है और हवा में दबाव बढ़ जाता है। यदि आप बहुत तेजी से ऊंचाई पर चढ़ते हैं, तो आपके शरीर के पास अधिक ऊंचाई पर पाई जाने वाली कम ऑक्सीजन युक्त हवा के साथ तालमेल बिठाने का समय नहीं होता है। आप जल्दी ही थकने लगते हैं और अधिक तेजी से सांस लेने के लिए मजबूर हो जाते हैं। यह हैंगओवर जैसे लक्षण पैदा कर सकता है - चक्कर आना, सिरदर्द और उल्टी आने लगती हैं।

ये होते है लक्षण
यदि आप पहाड़ों पर जाते हैं और एक्यूट माउंटेन सिकनेस को महसूस करते हैं, तो आपको ये लक्षण जरुर दिखेंगे-
थकान।
सिर दर्द।
मतली।
सांसों की कमी।
सोने में समस्या।
आप आमतौर पर ऊंचाई पर पहुंचने के कुछ घंटों के भीतर इन लक्षणों का अनुभव करेंगे। जैसे-जैसे आपका शरीर ऊंचाई के लिए ढ़ालने लगता है, ये लक्षण आमतौर पर अपने आप ठीक हो जाते हैं।

ज्यादा दिक्कत बढ़ने में दिख सकते हैं ये लक्षण-
बहुत कम मामलों में ऐसा होता है कि आप अधिक ऊंचाई पर पहुंचने पर शरीर ढलने में असमर्थ हों। नतीजतन, लक्षण अधिक गंभीर हो सकते हैं और आपके मस्तिष्क या फेफड़ों में जटिलताएं हो सकती हैं। यदि आप भ्रमित या विचलित महसूस करते हैं, तो इसका मतलब यह हो सकता है कि ऊंचाई आपके मस्तिष्क के कार्य को प्रभावित कर रही है।
यदि आपको सांस लेने में समस्या हो रही है, तो यह संकेत दे सकता है कि आपको फुफ्फुसीय एडिमा (pulmonary edema) की समस्या हो रही है, जहां आपके फेफड़ों में अतिरिक्त तरल पदार्थ जमा हो जाता है। यदि आप इनमें से किसी भी लक्षण का अनुभव करते हैं, तो तुरंत चिकित्सा सहायता लेनी जरुरी हो जाता है।

इसके अलावा ये गंभीर लक्षण भी देखने को मिल सकते है-
- साथी यात्री को कॉर्डिनेड करने में मुश्किल होना या चलने में परेशानी।
- गंभीर सिरदर्द जो ओटीसी दवाओं से ठीक नहीं होता है।
- आपके सीने में जकड़न या जमाव।
- खांसी और मुंह से गुलाबी पदार्थ जैसा कुछ निकलना।
उल्टी करना।

इस समस्या से बचने के लिए क्या करें
अधिक कैलोरी और ऊर्जा की जरूरत: कम आक्सीजन, कम तापमान के कारण शरीर में पर्याप्त ऊर्जा बनी रहे इसके लिए हमें अधिक कैलोरी की आवश्यकता होती है, क्योंकि पहाड़ों पर ऊर्जा का लेवल कम हो जाता है। इस स्थिति में हमें उच्च प्रोटीन और पर्याप्त वसा वाले कार्बोहाइड्रेट से भरपूर आहार की जरूरत पड़ती है।
खूब पानी पीएं : निर्जलीकरण को रोकने के लिए खूब पानी (प्रतिदिन तीन-चार लीटर) पिएं। सूखे मेवे उपयोगी भोजन साबित होते हैं। यात्रा के दौरान थकान से बचने के लिए श्रद्धालु यात्रा से छह सप्ताह पहले आयरन का सेवन बढ़ा सकते हैं। एल्कोहल से दूरी बनाएं रखें।
अस्थमा के रोगी ज्यादा ऊंचाई की यात्रा करने से बचे: बशर्ते उनका अस्थमा अच्छी तरह से नियंत्रित हो। एलर्जी, ठंडी हवा, हाइपोक्सिया और वायु घनत्व सहित कई पर्यावरणीय कारक अस्थमा, सांस या अन्य लक्षण फेफड़ों की बीमारी को नकारात्मक रूप से प्रभावित करते हैं।
सांस फूलने पर ध्यान दें: चढ़ते हुए अगर सांस फूले तो ऐसी स्थिति में चढऩा बंद कर दें और आराम करें। अगर राहत मिल जाए तो फिर धीमी गति से चढऩा शुरू करें , स्थिति बिगड़ने पर जल्द से जल्द चिकित्सकीय सहायता लेनी चाहिए।
नदी के पानी से नहाना अवॉइड करें: पहाड़ों पर कम तापमान में नदी के ठंडे पानी में स्नान करने से शरीर के तापमान में भी अचानक गिरावट आ जाती है। इसे हाइपोथर्मिया कहा जाता है। शरीर का न्यून तापमान (हाइपोथर्मिया) दिल, तंत्रिका तंत्र और अन्य अंगों को सदमे की स्थिति में ले जा सकता है।



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