जाने क्‍या है न्‍यूजीलैंड का सोशल बबल मॉडल, सोशल डिस्‍टेसिंग से कितना है अलग

कोरोना वायरस से बचाव के ल‍िए सोशल डिस्टेंसिंग को शुरुआत से ही सबसे ठोस उपाय के तौर पर अपनाया जा रहा है। इसके अलावा लॉकडाउन को लागू करके भी कोरोना के कैसेज को रोकने के भी प्रयास क‍िए गए लेकिन लॉकडाउन स्थाई उपाय नहीं है, इसलिए भारत समेत कई देशों में अब पाबंदिया हटाई जा रही हैं। कम होती पाबंदियों के बीच परिवार के सदस्य एक-दूसरे से मिलते हैं तो संक्रमण के मामले कम हो सकते हैं, ऐसा कहना है शोधकर्ताओं का। इस मॉडल को 'सोशल बबल' मॉडल कहा जा रहा है, जो कि पहले न्यूजीलैंड में अपनाया गया और अब ब्रिटेन में भी अपनाया जाएगा। आइए, जानते हैं इसके बारे में विस्तार से।

'सोशल बबल' मॉडल की खूब चर्चा

'सोशल बबल' मॉडल की खूब चर्चा

कोरोना संक्रमण से मुक्त होने के बाद दुनियाभर में न्यूजीलैंड के 'सोशल बबल' मॉडल की खूब चर्चा हो रही है। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने भी न्यूजीलैंड में अपनाए गए इस मॉडल को लागू करने की बात कही है। ब्रिटेन की ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी ने सोशल बबल मॉडल पर रिसर्च के बाद कहा है कि इस मॉडल को अपनाने से संक्रमण के मामले कम हो सकते हैं।

क्या है सोशल बबल :

क्या है सोशल बबल :

घरवाले, परिवार के सदस्य, दोस्त वगैरह जो अक्सर एक-दूसरे से मिलते रहते हैं, उनके समूह को ही सोशल बबल कहा जा रहा है। लॉकडाउन के दौरान भी इन्हें मिलने की अनुमति हो, जैसा कि न्यूजीलैंड में हुआ। न्यूजीलैंड में इस मॉडल का प्रयोग सफल रहा है। हालांकि मिलने के दौरान दूरी बरकरार रखना भी जरूरी है। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की रिसर्च कहती है कि अगर लोग छोटे-छोटे ग्रुप में एक-दूसरे से मिलें तो वायरस संक्रमण पर नियंत्रण पाया जा सकता है।

न्‍यूजीलैंड को मिली थी सफलता

न्‍यूजीलैंड को मिली थी सफलता

भारत, ब्रिटेन, अमेरिका जैसे देशों की तुलना में न्यूजीलैंड की आबादी 50 लाख से भी कम है। यहां पर फरवरी के अंतिम सप्ताह में कोरोना के मामले सामने आए और सरकार ने तैयारी शुरू कर दी। चिकित्सा विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों के साथ चार सूत्रीय कार्यक्रम तैयार किया गया, जिसमें 43 बिंदु शामिल थे। सोशल बबल इन्हीं 43 बिंदुओं में से एक था। न्यूजीलैंड में सात हफ्ते का सख्त लॉकडाउन रहा। इस बीच 1154 मामले सामने आए और महज 22 लोगों की मौत हुई। अब देश कोरोना मुक्त है।

सोशल डिस्टेंसिंग और सोशल बबल में अंतर

सोशल डिस्टेंसिंग और सोशल बबल में अंतर

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं के मुताबिक, सोशल बबल और सोशल डिस्टेंसिंग में अंतर हैं। सोशल डिस्टेंसिंग में लोगों को भीड़ या समूह में रहने की अनुमति नहीं होती ताकि एक-दूसरे के संपर्क में न आएं, जबकि सोशल बबल में घर में ही सदस्यों को, दोस्तों को या जॉबमेट को मिलने-जुलने की इजाजत रहती है। हालांकि बात करते वक्त पर्याप्त दूरी रखना जरूरी होता है।

कितना जरूरी है यह मॉडल?

कितना जरूरी है यह मॉडल?

लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स एंड पॉलिटिकल साइंस की रिसर्च कहती है कि यह मॉडल हाई रिस्क जोन में रहने वाले वैसे लोगों के लिए काफी राहत देने वाला है, जिन्हें ज्यादा देखभाल की जरूरत है। अकेले आइसोलेशन में रहने की अपेक्षा यह ज्यादा जरूरी है। शोधकर्ताओं का कहना है कि बहुत सारे लोग इन दिनों तनाव में हैं, उनकी स्थिति ठीक नहीं है। उनके लिए यह मॉडल राहत देने वाला होगा।

दूरी बनाना ही है उपाय

दूरी बनाना ही है उपाय

नेचर ह्यूमन बिहैवियर जर्नल में प्रकाशित सोशल बबल मॉडल पर ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की रिसर्च के मुताबिक, आइसोलेशन से बेहतर है आपस में दूरी बनाकर मिला जाए। शोधकर्ता प्रो. मेलिंडा का कहना है कि इस तरह लंबे समय तक कोरोना संक्रमण का ग्राफ बढ़ने से रोका जा सकता है।

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