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Eid Milad-un-Nabi Ki Dua : ईद-ए-मिलाद-उन-नबी नमाज़ और इस दिन पढ़ी जाती है ये खास दुआ
Eid Milad-un-Nabi Ki Dua : इस्लाम धर्म में रबी-अल-अव्वल का महीना बेहद खास माना जाता है, क्योंकि इसी महीने की 12वीं तारीख को आख़िरी पैग़म्बर हज़रत मोहम्मद का जन्म हुआ था। इस दिन को ईद मिलाद-उन-नबी या मौलिद कहा जाता है। इसे बाफारात भी कहा जाता है क्योंकि माना जाता है ये दिन पैगम्बर मोहम्मद साहब के इंतेकाल का भी दिन है। पूरी दुनिया में मुसलमान इस दिन को अकीदत और मोहब्बत के साथ मनाते हैं। मस्जिदों और घरों में सजावट होती है, नात-ए-पैगंबर पढ़ी जाती है और सबसे अहम - नमाज़ और दुआओं के जरिए अल्लाह से रहमत मांगी जाती है।

12वीं रबी-अल-अव्वल की अहमियत
हज़रत मोहम्मद की पैदाइश ने इंसानियत को अंधेरे से रोशनी की तरफ़ राह दिखाई। इस्लाम की तालीमात में यह दिन रहमतों और बरकतों का पैगाम देता है। कुरान और हदीस की रौशनी में, यह दिन हमें मोहम्मद ﷺ की सीरत को अपनाने और उनके बताए हुए रास्ते पर चलने का मौका देता है। यही वजह है कि दुनिया के कई हिस्सों में इस दिन को आधिकारिक तौर पर जश्न-ए-ईद मिलाद-उन-नबी के रूप में मनाया जाता है।
ईद मिलाद-उन-नबी पर नमाज़ की अहमियत
हालांकि पांच वक्त की नमाज़ इस्लाम में हर दिन फर्ज़ है, लेकिन 12वीं रबी-अल-अव्वल के दिन मुसलमान खास तौर पर अतिरिक्त नफ़्ल नमाज़ें अदा करते हैं। नमाज़ अदा करने के बाद दुरूद शरीफ पढ़ना और पैगंबर पर सलाम भेजना इस दिन का अहम हिस्सा होता है।
नमाज़ का तरीका
फज्र की नमाज़ - सुबह की नमाज़ अदा करने के बाद दुरूद-ए-इब्राहीमी और दुआ पढ़ी जाती है।
ज़ुहर की नमाज़ - नमाज़ के बाद पैगंबर की सीरत और उनकी सुन्नतों का तज़किरा किया जाता है।
अस्र की नमाज़ - इस वक्त नफ़्ल नमाज़ें पढ़ी जाती हैं और उम्मत-ए-मुस्लिमा की सलामती की दुआ मांगी जाती है।
मग़रिब की नमाज़ - मग़रिब के बाद अक्सर मिलाद की महफ़िल सजाई जाती है, जिसमें नात शरीफ और कुरान की तिलावत की जाती है।
इशा की नमाज़ - इशा के बाद दुरूद-ओ-सलाम और नफ़्ल नमाज़ें अदा करना आम है।
ईद मिलाद-उन-नबी की दुआएं
दुआ अल्लाह से जुड़ने और अपनी हाजतें रखने का सबसे बेहतरीन ज़रिया है। इस दिन जो दुआएं की जाती हैं, उनमें अक्सर रहमत, बरकत और गुनाहों की माफी मांगी जाती है।
कुछ खास दुआएं
पैगंबर पर दुरूद
"अल्लाहुम्मा सल्लि अला मोहम्मदिन वा अला आली मोहम्मदिन, कमा सल्इता अला इब्राहीमा वा अला आली इब्राहीमा, इन्नका हमीदुन मजीद।"
इसका मतलब है - "हे अल्लाह, मोहम्मद और उनके परिवार पर रहमत नाज़िल कर, जैसे तूने इब्राहीम और उनके परिवार पर रहमत भेजी।"
रहमत और मग़फिरत की दुआ
"रब्बना आति ना फ़िद्दुन्या हसनतन वफ़िल आख़िरति हसनतन वक़िना अज़ाबन्नार।"
मतलब - "हे हमारे पालनहार, हमें दुनिया और आख़िरत में भलाई अता कर और हमें जहन्नुम के अजाब से बचा।"
उम्मत की सलामती की दुआ
"अल्लाहुम्मा इह्फ़ज़ उम्मत-ए-मोहम्मए, वारह्म उम्मत-ए-मोहम्मद, वसल्लिम उम्मत-ए-मोहम्मद।"
मतलब - "हे अल्लाह, मोहम्मद की उम्मत की हिफाज़त कर, रहमत नाज़िल कर और उन्हें सलामती बख़्श।"
ईद मिलाद-उन-नबी पर अमल
- गरीबों और जरुरतमंदों को खाना खिलाना
- मस्जिदों में चरागाँ और सजावट करना
- बच्चों को पैगंबर की सीरत सुनाना
- नात और सलाम की महफ़िल में शरीक होना
- तिलावत-ए-कुरान और दुरूद-ओ-सलाम की महफ़िल का हिस्सा बनना
संदेश
ईद मिलाद-उन-नबी केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि पैगंबर की तालीमात को अपनी जिंदगी में उतारने का दिन है। मोहम्मद ने हमें मोहब्बत, इंसाफ़, बराबरी और इंसानियत का सबक दिया। इस दिन की नमाज़ें और दुआएं हमें अल्लाह से करीब करती हैं और यह एहसास दिलाती हैं कि हमें अपने पैगंबर के बताए रास्ते पर चलना चाहिए।



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