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जगन्नाथ भगवान की आंखें क्यों हैं बड़ी? कारण जान आप भी रह जाएंगे हैरान
जगन्नाथ पुरी मंदिर में भगवान जगन्नाथ की प्रतिमा देखने के बाद सभी के मन में एक ना एक बार तो ये सवाल जरूर आता है कि आखिर भगवान की आंखें इतनी बड़ी और गोल आकार की क्यों हैं? इतना ही नहीं उनके भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की आंखे भी बड़ी है।
आपने अभी तक जितने भी भगवान की मूर्ति या तस्वीर देखी होगी, सभी में भगवान का चेहरा उनके मानव रूप के अनुसार ही दिखाया गया है। लेकिन भगवान जगन्नाथ की आंखे सबसे अलग और अनोखी है, जो अपने अंदर कई रहस्य छुपाए बैठा है। भगवान जगन्नाथ श्री कृष्ण भगवान का ही एक रूप हैं, इसके बाद भी इनकी आंखें इतनी अलग क्यों हैं आइए जानते हैं।

भगवान जगन्नाथ की बड़ी आंखों के पीछे छुपा रहस्य
भगवान जगन्नाथ और उनके भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की आंखे बड़ी होने के पीछे एक रोचक कहानी भी जुड़ी है। ऐसा कहा जाता है कि जब भगवान श्रीकृष्ण ने द्वारका में वास कर लिया था, तो वृंदावन से नंद बाबा, यशोदा माता और रोहिणी मां उनसे मिलने आए। द्वारकावासी भगवान श्रीकृष्ण को अपना ईश्वर मानते थे, जबकि वृंदावनवासी उन्हें अपना प्रेमी मानते थे।
द्वारका में एक दिन रोहिणी माता द्वारकावासियों को भगवान श्रीकृष्ण के वृंदावन में की गई रासलीला, सुना रही थी। इस दौरान उन्होने भगवान कृष्ण की बहन सुभद्र को द्वार पर जाकर खड़े रहने को कहा। भगवान श्रीकृष्ण की रासलीला सुन द्वारकावासी उनकी कथाओं में डूबे हुए थे। वहीं दूसरी और सुभद्र दरवाजे पर उदास खड़ी थी। उन्हें उदास देखकर दोनों भाई बलराम और कृष्ण भी उनके दाएं और बाएं आकर खड़े हो गए। जहां से वो भी रोहिणी माता द्वारा भगवान कृष्ण के बचपन की कथाएं छुपके से सुनने लगे। भगवान श्रीकृष्ण की अनोखी कथाएं सुनकर तीनों हैरान रह गए। जिस समय उउनकी आंखें पूरी तरह खुली की खुली रह गई।
ऐसा कहा जाता है कि इस समय नारद मुनि भी धरती पर आ गए थे, जहां उन्होने तीनों भाई बहन को इस तरह साथ देखकर इस अवस्था में हैरान रह गए। जिसके बाद उन्होने प्रार्थना की कि भगवान श्रीकृष्ण और उनके भाई बहन के इस अनोखे रूप के दर्शन सभी भक्त कर सकें।
मूर्ती के निर्माण के पीछे है ये कहानी
जानकारी के अनुसार जगन्नाथ पुरी मंदिर में भगवान जगन्नाथ की प्रतिमा विश्वकर्मा जी ने राजा इन्द्रद्युम्न के आदेश पर एक बंद कमरे में तैयार की थी। ऐसे में इनकी प्रतीमा की आंखों क्यों इतनी बड़ी बनाई गई इस बात का आज तक कोई लिखित या मौखिक प्रमाण नही मिल सका है।
ऐसा कहा जाता है कि शिल्पकार विश्वकर्मा जी ने राजा के सामने ये मूर्ती बनाने के लिए शर्त रखी थी कि वे एक बंद कमरे में अकेले इन मूर्तियों का निर्माण करेंगे और इस बीच कमरे में किसी अन्य व्यक्ति के आने की अनुमति नहीं होगी।
लेकिन राजा इंद्रद्युम्न किसी अनहोनी की आशंका के कारण मूर्ती के निर्माण के बीच में ही उस कमरे में चले गए। जिसके बाद उन्होने देखा कि विश्वकर्मा जी आधी अधूरी मूर्ती बनाकर वहां से गायब हो गए। जिसके बाद भगवान जगन्नाथ राजा के सपने में आए और उन्हें आदेश दिया कि वे अधूरी मूर्तियों को ही मंदिर में स्थापित करे।
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