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शास्त्रों के अनुसार इस समय रतिक्रिया करने से होती है उतम संतान

हिंदू शास्त्रों में हमारे जीवन में विवाह और शारीरिक संबंधों को बहुत महत्वपूर्ण माना गया है, कामशास्त्र ग्रंथ और खजुराहों के मंदिर भी इस बात के प्रतीक है। हिंदू धर्म में शारीरिक संबंध को अपना परिवार एवं वंश आगे बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
शास्त्रों में शारीरिक आकर्षण एवं संभोग जैसी बातों का जिक्र आप पा सकते हैं। शारीरिक आकर्षण पति-पत्नी के बीच हो या अनजान स्त्री-पुरुष के बीच, हर तरह के संबंध के साक्षी रहे हैं हिन्दू शास्त्र।
पति-पत्नी को कब शारीरिक संबंध स्थापित करने चाहिए एवं कब नहीं, इस बात का उल्लेख भी शास्त्रों में किया गया है। इससे संबंधित जानकारी मनुष्य ब्रह्मवैवर्त पुराण में पा सकता है। शास्त्रों के अनुसार रतिक्रिया का एक उचित समय होता है, जिसमें यदि यह किया जाए तो शादीशुदा जोड़े को उतम संतान की प्राप्ति होती है। आज इस विषय पर हम यहां चर्चा करेंगे। यह जानकारी आपने पहले कभी प्राप्त नहीं की होगी, लेकिन यह हर किसी के काम अवश्य आती है। कामसूत्रा: सेक्स आर्ट और पॉजिशन के अलावा कमाल की बातें छिपी है इस प्राचीन किताब में

रतिक्रिया का समय
रतिक्रिया करने का उद्देश्य धर्म शास्रों के अनुसार संतान उत्पत्ति ही है। आज के मनुष्य के लिए भले ही यह आनंद का भी माध्यम हो, लेकिन शास्त्र इसे गृहस्थी बढ़ाने से ही अधिक जोड़ते हैं।
आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि रतिक्रिया के समय से ही होने वाली संतान का भविष्य निर्धारित होता है। इसलिए यह जानना अति आवश्यक हो जाता है कि किस समय की गई रतिक्रिया हमें अच्छी संतान देती है, जो तन एवं मन दोनों से ही सर्वश्रेष्ठ हो।

रात के पहले पहर में
शास्त्रों की मानें तो रात का समय ही रतिक्रिया के लिए पर्याप्त माना गया है, किंतु क्या रात्रि का कोई भी समय इसके लिए सही है? शायद नहीं... क्योंकि शास्त्रों ने रात्रि के समय में से एक ऐसा समय हमारे सामने प्रस्तुत किया है जो यदि रतिक्रिया के लिए उपयोग में लाया जाए तो उत्तम संतान की प्राप्ति होती है।
धर्मशास्त्र कहते हैं रात्रि का पहला पहर रतिक्रिया के लिए उचित समय है। यह एक मान्याता है कि जो रतिक्रिया रात्रि के प्रथम पहर में की जाती है, उसके फलस्वकरूप जो संतान का जन्मह होता है, उसे भगवान शिव का आशीष प्राप्त होता है। क्या आपने कभी सुना है तांत्रिक सेक्स के बारे में? जानिए इस प्राचीन सेक्स अभ्यास के बारे में

उतम संतान की उत्पति होती है
कहा गया है कि ऐसी संतान सभी गुणों से सम्पन्न होती है। इस समय पर रतिक्रिया करने से आने वाली संतान अपनी प्रवृत्ति एवं संभावनाओं में धार्मिक, सात्विक, अनुशासित, संस्कातरवान, माता-पिता से प्रेम रखने वाली, धर्म का कार्य करने वाली, यशस्वी एवं आज्ञाकारी होती है।
चूंकि ऐसे जातकों को शिव का आर्शीवाद प्राप्त होता है, इसलिए वे लंबी आयु जीते हैं एवं भाग्यक के भी प्रबल धनी होते हैं।

क्यों है यह समय सर्वश्रेष्ठ ?
लेकिन रात्रि के इस प्रथम पहर को ही रतिक्रिया के लिए सर्वश्रेष्ठ क्यों माना गया है? इसके पीछे का धार्मिक एवं शास्त्रीय महत्व क्या है? क्या कोई ठोस कारण है
दरअसल रात्रि का प्रथम पहर धार्मिक मान्यता के अनुसार पवित्र माना गया है। क्योंकि प्रथम पहर के बाद राक्षस गण पृथ्वी लोक के भ्रमण पर निकलते हैं। इसलिए यह रतिक्रिया प्रथम पहर समाप्त होने से पहले ही की जानी चाहिए।
क्योंकि इसके बाद जो रतिक्रिया की गई हो, उससे उत्परन्नम होने वाली संतान में राक्षसों के ही समान गुण आने की प्रबल संभावना होती है। इसके चलते वह संतान भोगी, दुर्गुणी, माता-पिता एवं बुजुर्गों की अवमानना करने वाली, अनैतिक, अधर्मी, अविवेकी एवं असत्यु का पक्ष लेने वाली होती है।

रात का पहला पहर?
लेकिन अगर घड़ी के समय के अनुसार जानना हो तो प्रथम पहर कौन सा होता है? धर्म शास्त्रों का अध्ययन करने के बाद यह पाया गया है कि रात्रि का पहला पहर घड़ी के अनुसार बारह बजे तक रहता है और इसी समय काल को रतिक्रिया के लिए उचित माना गया है।

अन्य पहर में शारीरिक संबंध नहीं बनाएं
और इसके अलावा शेष बचा रात्रि का समय रतिक्रिया के लिए अशुभ माना गया है क्योंकि इन अन्य पहरों में की गई रतिक्रिया से ना केवल होने वाली संतान अवगुणी होती है बल्कि साथ ही पति-पत्नी के जीवन में भी शारीरिक, मानसिक एवं आर्थिक कष्ट आते हैं।



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