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जानिये, छट पूजा की खासियत और क्या होता है इस दिन
दिवाली के छह दिन बाद मनाया जाने वाला छठ त्योहार एक प्राचीन त्योहार है। इस त्योहार में चार दिन तक भगवान सूर्य की पूजा की जाती है।
इस त्योहार के लिए घाटों को सजाया जाता है, सड़के साफ़ की जाती हैं और सभी प्रकार के प्रबंध किये जाते हैं क्योंकि मुख्यत: बिहार और उत्तर प्रदेश के लोगों के लिए यह एक बहुत महत्वपूर्ण त्योहार है।
दिवाली के छह दिन बाद मनाया जाने वाला छठ त्योहार एक प्राचीन त्योहार है। इस त्योहार में चार दिन तक भगवान सूर्य की पूजा की जाती है।
चार दिनों तक चलने वाला यह त्योहार एक कठिन त्योहार भी माना जाता है। जो लोग पूजा करते हैं विशेष रूप से महिलायें, उन्हें इन चार दिनों में लंबे समय तक बिना अन्न और जल के रहना पड़ता है।

पहले दिन को “नहान खान” या “नहाई खाई” कहा जाता है। इस दिन लोग सुबह नदी या तालाब में डुबकी लगाते हैं तथा उसी नदी या तालाब का पानी घर ले जाते हैं।

इस पानी का उपयोग भगवान सूर्य के लिए प्रसाद बनाने में किया जाता है। घर और आसपास की जगह की साफ़ सफ़ाई की जाती है। इस दिन पूजा करने वाले लोग दिन में केवल एक बार ही खाना खाते हैं।

दूसरे दिन लोहंडा मनाया जाता है जब महिलाएं पूरे दिन उपवास करती हैं तथा सूर्यास्त के बाद ही उपवास तोडती हैं। उसके बाद 36 घंटे का कठिन उपवास शुरू होता है जब महिलाएं एक घूँट पानी भी नहीं पीती।
छठ के दिन प्रसाद बनाने के बाद महिलाएं नदी या तालाब में डुबकी लगाती हैं और सूर्य भगवान और छठी मैया की पूजा करती हैं।

पूरा परिवार, मित्र आदि लोग नदी या तालाब पर महिला के साथ जाते हैं क्योंकि वे डूबते सूर्य को “संध्या अर्घ्य” चढ़ाते हैं जबकि अन्य लोग इस पर्व के लिए बने हुए लोकगीत गाते हैं।

चौथे दिन भक्त उसी तालाब या नदी के किनारे एकत्र होते हैं और उगते सूर्य को “उषा अर्घ्य” चढ़ाते हैं। इस पूजा के बाद ही पूजा करने वाले लोग अपना उपवास तोड़ते हैं। उसके बाद परिवार के सदस्यों और मित्रों के बीच प्रसाद बांटा जाता है।

प्रसाद में मुख्य रूप से फल और मिठाईयां होते हैं। सभी घरों में इस त्योहार पर ठेकुआ नाम की मिठाई बनाई जाती है जिसे प्रसाद के रूप में चढ़ाया जाता है।



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