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Durga Puja: धुनुची नाच और सिंदूर खेला का होता है बहुत महत्व, जाने बंगाली रीती-रिवाज

पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा सिर्फ एक परंपरा, त्योहार या रिवाज नहीं है, बल्कि यह वहां रह रहें लोगों की लाइफस्टाइल का एक हिस्सा बन चुकी है। शारदीय नवरात्रि के दौरान बंगाल में दुर्गा पूजा 9 दिनों तक चलने वाला त्योहार है। इस त्योहार को बंगाल में बड़े पैमाने पर मनाया जाता है। यह महिषासुर नाम के राक्षस पर मां दुर्गा की जीत को दर्शाता है। मां दुर्गा महिला सशक्तिकरण का प्रतीक हैं, बंगाल के अधिकतर घरों में महिलाओं को मां दुर्गा के समान ही बहादूर माना जाता है। बंगाल में इस त्योहार को बहुत धूम-धाम से मनाया जाता है। इस त्योहार को लेकर लोगों में काफी क्रेज देखने को मिलता है। इस त्योहार के दौरान कई तरह के रीति-रिवाजों का पालन किया जाता है। जिनमें से कुछ खास रीति-रिवाजों के बारे में हम आपको बताने जा रहे हैं।

1. अंजलि
जहां देवी दुर्गा की पूजा से जुड़े सभी संस्कार और अनुष्ठान पूजारी करते हैं, वहीं वहां मौजूदबाकी सभी लोग मां को अपने हाथों में फूल लेकर मां को फूल अर्पित करते हैं। इस रीति को अंजलि कहा जाता है, जो अष्टमी के दिन होती है। अंजलि की रश्म हमेशा सुबह के समय होता है। बंगाल में तब तक व्रत रखने का रिवाज है, जब तक आप अंजलि नहीं चढ़ाते है। तय समय पर, सभी लोग स्नान करते हैं, नए कपड़े पहनकर मां दुर्गा के सामने इकट्ठे होकर अपने हाथों में बेल के पत्तों के साथ फूल लेकर पुजारी के बाद मंत्र दोहराते हैं और देवी के ऊपर फेंकते हैं। इस अंजलि की रश्म को 3 से 5 बार दोहराया जाता है।

2. कन्या पूजन
कन्या पूजा अष्टमी के दिन की जाती है। यह एक अनुष्ठान होता है, जिसें कुछ कुवारी लड़कियों को दुर्गा के जीवित अवतार के रूप में पूजा जाता है। इन कन्याओं को देवी दुर्गा के रूप में तैयार किया जाता हैं। और उनकी पूजा की जाती है।

3. धुनुची नाच
बंगाल का धुनुची नाच बहुत मशहूर है। यहां एक भक्ति नृत्य है जो रात में दुर्गा आरती के बाद मां दुर्गा का आभार जताने के लिए किया जाता है। धुनुची नाच को ढाक की थाप पर किया जाता है। इस नाच को आत्म-रोधक और शुद्ध करने वाले गुणों के लिए भी जाना जाता है। इस नाच के समय महिलाएं बंगाली पोशाक पहन कर करती हैं।

4. सिंदूर खेला
दशमी के दिन मां दुर्गा को विसर्जन के लिए ले जाने से पहले विदाई दी जाती है। उससे पहले सिंदूर खेला की रश्म होती है। इस रश्म को विवाहित महिलाएं अपने पारंपरिक बंगाली पोशाक में तैयार होकर करती है। इस दौरान मां दुर्गा को सिंदूर और मिठाई चढ़ाया जाता हैं। इसके बाद, सभी महिलाएं एक दूसरे के साथ सिंदूर से खेलते हैं। आज के समय में अविवाहित महिलाओं ने भी सिंदूर खेल में हिस्सा लेना शुरू कर दिया है।

5. मां का विसर्जन
मां दुर्गा की प्रतिमा का नदी में विसर्जन किया जाता है। जिसके लिए पंडाल से लेकर नदी तक एक जुलूस निकाला जाता है। मान्यताओं के मुताबिक, इस जुलूस के जरिए मां दुर्गा पर्वत पर वापस लौट आती हैं। मूर्तियों को एक ट्रक के माध्यम से नदी के किनारे तक ले जाया जाता है। फिर मूर्तियों को एक नाव की मदद से नदी के बीच ले जाकर विसर्जित कर दिया जाता है।



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