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गीता जयंती के दिन ही श्रीकृष्ण ने अर्जुन को दिया था गीता उपदेश, जानें इस साल की तिथि, पूजा मुहूर्त व महत्व
श्रीमद् भगवत गीता हिन्दू सनातन धर्म का सबसे पवित्र धर्म ग्रन्थ है। गीता के उपदेशों में मानव जीवन का सम्पूर्ण सार छिपा हुआ है। मान्यताओं के अनुसार मोक्षदा एकादशी के दिन ही द्वापर युग में भगवान् श्री कृष्ण ने महाभारत युद्ध के दौरान कुरुक्षेत्र में अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था। तभी इस तिथि को गीता जयंती के रूप में मनाया जाता है। गीता जयंती के उपलक्ष्य में देश भर में कई स्थानों पर गीता मेले का आयोजन भी किया जाता है। इन मेलों में गीता का पाठ, गीता के उपदेशों का नाट्य रूपांतरण और विशेष पूजा अर्चना के प्रबंध कराये जाते है। कुरुक्षेत्र में भी एक खास विश्वस्तरीय मेले का आयोजन होता है, जो इस वर्ष 2 से 19 दिसम्बर तक चलने वाला है। गीता जयंती का हिन्दू धर्म में विशेष महत्व है। आइये जानते हैं इस साल की गीता जयंती किस दिन पड़ रही है और क्या है पूजन विधि।

गीता जयंती की तिथि
मार्गशीर्ष महीने में शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि की शुरुआत 13 दिसंबर को रात्रि 9:32 बजे से शुरू होकर 14 दिसंबर रात्रि 11:35 बजे तक है। इस हिसाब से मोक्षदा एकादशी और गीता जयंती 14 दिसंबर को मनाई जाएगी। गीता के उपदेश में मोह के क्षय होने यानी खत्म होने की बात कही है इसीलिए इस दिन को पड़ने वाली एकादशी को मोक्षदा कहा गया। 14 दिसंबर को दिनभर भगवान श्रीकृष्ण की पूजा उपासना कर सकते हैं।

गीता जयंती का महत्व
गीता में मानव जीवन का सार है। जीवन में मनुष्य को क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना करना चाहिए इसकी विस्तृत व्याख्या गीता के 18 अध्यायों में मिलती है। इसमें सांसारिक, व्यवहारिक, पारिवारिक, व्यक्तिगत एवं सामाजिक आचरण सम्बन्धी उपदेश है। नियमित रूप से गीता का पाठ करने से मनुष्य को जीवन से सम्बंधित कई सवालों का जवाब मिलता है और कई मौकों पर सही दिशा मिलती है।

पूजन एवं व्रत विधि
गीता जयंती के दिन मोक्षदा एकादशी भी है, इसलिए साधक इस दिन व्रत का पालन कर सकते हैं। एक दिन पहले ही तामसिक भोजन का त्याग कर दें। 14 की सुबह जल्दी उठकर गंगाजल युक्त जल से स्नान लें और "ॐ गंगे" का मंत्रोउच्चारण करें। इसके बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करके भगवान विष्णु और श्री कृष्ण की पूजा पीले फल, पुष्प, धूप-दीप आदि चीजों से करें। इसके बाद श्रीमद् भगवत गीता की पूजा करके उसका पाठ करें। अंत में आरती करके सुबह की पूजा संपन्न करें। दिन भर व्रत का पालन करें और संध्याकाल में आरती के बाद फलाहार करें।



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