सूतक और पातक क्यों लगता है, जानें इसके पीछे का धार्मिक और वैज्ञानिक कारण

इंसान की जिंदगी में ऐसे अनेक पड़ाव आते है जो उसके जन्म के साथ शुरू होकर मृत्यु तक उसके साथ चलते रहते है। और इन पड़ावों को जब हम परंपरा के साथ जोड़ते है तो इसका महत्व और बढ़ जाता है। जिसमें सूतक और पातक दो ऐसे शास्त्रोक्त विधान है जिसमें इंसान के जीवन को नियमों के सूत्रों में पिरोया जाता है। लेकिन बहुत कम लोग जानते है कि सूतक और पातक क्या होते हैं और उनका जीवन पर क्या असर पडता है। तो यहां हम आपको सूतक और पातक से जुड़े तथ्यों और इसके वैज्ञानिक विधान के बारे में बताने जा रहे है।

बच्चे के जन्म के समय लगता है सूतक -

बच्चे के जन्म के समय लगता है सूतक -

जब किसी परिवार में बच्चे का जन्म होता है तो उस परिवार में सूतक लग जाता है। जन्म के बाद नवजात की पीढ़ियों को हुई अशुचिता 3 और 4 पीढ़ी तक -10 दिन रहती है। जबकि 5 पीढ़ी तक - 6 दिन गिनी जाती है। एक रसोई में भोजन करने वालों के पीढ़ी नहीं गिनी जाती, वहाँ पूरा 10 दिन का सूतक माना है। इन दस दिनों में घर के परिवार के सदस्य धार्मिक गतिविधियां में भाग नहीं ले सकते हैं। साथ ही बच्चे को जन्म देने वाली स्त्री के लिए 40 से 45 दिन तक रसोईघर में जाना और दूसरे काम करने का भी निषेध रहता है। जब तक की घर में हवन न हो जाए, प्रसूता स्त्री रसोई के काम करने के लिए शुद्ध नहीं मानी जाती। शास्त्रों के अनुसार सूतक की अवधि विभिन्न वर्णो के लिए अलग-अलग बताई गई है। ब्राह्मणों के लिए सूतक का समय 10 दिन का, वैश्य के लिए 20 दिन का, क्षत्रिय के लिए 15 दिन का और शूद्र के लिए यह अवधि 30 दिनों की होती है।

मृत्यु के बाद लगता है पातक –

मृत्यु के बाद लगता है पातक –

जिस तरह घर में बच्चे के जन्म के बाद सूतक लगता है उसी तरह गरुड़ पुराण के अनुसार परिवार में किसी सदस्य की मृत्यु होने पर लगने वाले सूतक को ' पातक ' कहते हैं। इसमें परिवार के सदस्यों को उन सभी नियमों का पालन करना होता हैं , जो सूतक के समय किए जाते हैं। पातक में विद्वान ब्राह्मण को बुलाकर गरुड़ पुराण का वाचन करवाया जाता है। गरुण पुराण के अनुसार पातक लगने के 13वें दिन क्रिया होनी चाहिए और उस दिन ब्राह्मण भोज करवाना चाहिए। जिसके बाद मृत व्यक्ति की सभी नई-पुरानी वस्तुओं एवं कपड़ों को गरीब और असहाय व्यक्तियों में बांट देना चाहिए। पातक के दिनों की गणना मृत्यु के दिन से नहीं होती, बल्कि उस दिन से होती है जब दाह-संस्कार किया जाता है। अगर किसी घर का कोई सदस्य बाहर या विदेश में है, तो जिस दिन मृत्यु की सूचना मिलती है, उस दिन से शेष दिनों तक उसके पातक लगता है। लेकिन अगर मृत्यु की ये सूचना 12 दिन बाद मिले तो स्नान-मात्र करने से शुद्धि प्राप्त हो जाती है।

सूतक और पातक के पीछे वैज्ञानिक विधान -

सूतक और पातक के पीछे वैज्ञानिक विधान -

'सूतक' और 'पातक' केवल धार्मिक कर्मंकांड नहीं है। बल्कि इन दोनों के पीछे महत्वपूर्ण वैज्ञानिक तथ्य भी हैं। दरअसल जब परिवार में बच्चे का जन्म होता है या किसी सदस्य की मृत्यु होती है उस स्थिति में संक्रमण फैलने की संभावना काफी ज्यादा बढ़ जाती है। ऐसे में अस्पताल या शमशान या घर में नए सदस्य के आगमन, किसी सदस्य की अंतिम विदाई के बाद घर में संक्रमण का खतरा मंडराने लगता है। इसलिए इन दोनों ही प्रक्रियाओं को बीमारियों से बचने के उपाय के रूप में भी लिया जा सकता है, जिसमें घर और शरीर की शुद्धी की जाती है। आमतौर जब 'सूतक' और 'पातक' की अवधि समाप्त हो जाती है तो घर में हवन किया जाता है, जिसके पीछे का उदेश्य वातावरण को शुद्ध करना है ताकि हवा में जितनी भी तरह की अशुद्धियां है वो नष्ट हो जाए। हवन के बाद परम पिता परमेश्वर से नई शुरूआत के लिए प्रार्थना की जाती है। जिसके बाद सभी सामान्य जिंदगी जीने की तरफ अग्रसर होते है।

Story first published: Wednesday, August 31, 2022, 10:00 [IST]
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