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इस गांव के लोग करते हैं बजरंगबली से नफ़रत

हम अकसर ऐसा कहते हैं कि हमें हमारे अच्छे बुरे कर्मों का फल भगवान देते हैं परन्तु स्वयं भगवान से कोई गलती हो जाए तो उन्हें सज़ा कौन दे सकता है। सोचने वाली बात है कि क्या वाकई में ईश्वर से भी गलतियां हो सकती हैं और वह सज़ा के पात्र बन सकते हैं। जी हाँ, उत्तराखंड के एक गाँव के लोग इस बात को सच साबित कर चुके हैं कि हमारे देवी देवता भी गलतियां कर सकते हैं और उन्हें सज़ा भी मिलती है। लेकिन इनकी नाराज़गी आख़िर किस देवता से है और क्यों है। हम आपको बता दें कि यहां के लोग मर्यदापुरुषोतम श्री राम के परम भक्त बजरंगबली को नहीं मानते हैं और न ही उनकी पूजा करते हैं।
एक ओर जहां समस्त संसार हनुमान जी की भक्ति को परम सुख मानता है वहीं इस गाँव में इनकी पूजा वर्जित है। इतना ही नहीं पूरे गाँव में हनुमान जी का एक भी मंदिर नहीं है।
आइए जानते हैं ऐसी कौन सी वजह है जो यहां के लोगों की नाराज़गी का कारण बनी हुई है।

कहा जाता है कि जब लंकापति रावण के पुत्र मेघनाथ से श्री राम, लक्ष्मण और पूरी वानर सेना का भयंकर युद्ध हो रहा था तब मेघनाथ ने अपने शक्ति बाण से लक्ष्मण जी को और कई वानरों को घायल कर दिया था। तब संजीवनी को तलाशते हुए बजरंबली उत्तराखंड के सीमांत जनपद चमोली के द्रोणागिरि गांव पहुंचे थे। यह गांव लगभग 14000 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। जब वे वहां पहुंचे तो उन्हें चारों ओर केवल पहाड़ ही पहाड़ नज़र आये वे समझ ही नहीं पा रहे थे कि आख़िर संजीवनी बूटी उन्हें कहा मिलेगी। तब अचानक उनकी नज़र एक वृद्ध महिला पर पड़ी। हनुमान जी ने उन से पूछा कि संजीवनी बूटी कहाँ मिलेगी तो उस वृद्ध महिला ने एक पर्वत की तरफ इशारा किया और वहां से चली गयी। इसके बाद बजरंबली उस पर्वत पर पहुंचे किंतु संजीवनी को पहचानने में वे अब भी असमर्थ थे इसलिए उन्होंने पूरा का पूरा पर्वत ही उठा लिया और श्री राम के पास ले गए।
बजरंबली के ऐसा करने से लक्ष्मण जी की जान तो बच गई लेकिन द्रोणागिरी के लोग इस बात से नाराज़ हो गए क्योंकि ऐसी मान्यता है कि वह पर्वत इसी गाँव में स्थित था और यहाँ के लोग उस पर्वत की पूजा करते थे।

वृद्ध महिला का कर दिया गया था समाज से बहिष्कार
ये भी कहा जाता है कि जिस महिला ने बजरंबली की मदद की थी और संजीवनी बूटी के बारे में बताया था उसे समाज से निकाल दिया गया था। इतना ही नहीं इस गाँव में पर्वत देव की विशेष पूजा की जाती है जिस दिन यह पूजा होती है उस दिन यहाँ के पुरुष महिलाओं के हाँथ का बना भोजन ग्रहण नहीं करते और ना ही महिलाओं को इस पूजा में हिस्सा लेने की अनुमति है।

लाल ध्वज लगाना भी वर्जित है यहां
बजरंबली से यहां के लोग इस कदर रूठे हुए हैं कि यहां पर लाल ध्वज जिसे उनका प्रतीक माना जाता है उसे तक लगाने की मनाही है।



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