कभी सोचा है, नदी और तालाब किनारे ही क्‍यों किया जाता है श्राद्ध ?

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यह प्रथा पुरातनकालीन भारतीय हिन्दू परंपरा के अनुसार तर्पण हमेशा नदी के किनारे ही किया जाता है। आपने कभी सोचा है कि तर्पण हमेशा ही नदी किनारे क्यों किये जाते हैं? क्या और कोई भी स्थान है जहां तर्पण दिए जा सकते हों?

कैसा शुरु हुआ था श्राद्ध, किसने सबसे पहले किया था श्राद्ध? 

इतिहास गवाह है कि संसार की सभी सभ्यताएं नदी किनारे ही फली-फूली हैं। इसलिए नदियों को प्राचीन काल से ही पवित्र माना गया है। हर पावन कार्य इनके किनारों पर ही पूरा होते हैं और चूंकि तर्पण को भी पवित्र माना जाता है इसलिए तर्पण हमेशा नदी के किनारों पर ही संपन्न होते हैं।

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ये भी है एक कारण...

ये भी है एक कारण...

इसके अलावा एक कारण और भी है, श्राद्ध ऐसी जगह किया जाना चाहिए जो किसी के आधिपत्य में नहीं आती है। नदियां और तालाब किसी के नहीं होते इसलिए उन स्थानों पर श्राद्ध कर्म करके उसी के जल से पितरों का तर्पण किया जाता है। श्राद्ध पक्ष में पितरों का तर्पण मुख्य कर्म माना गया है। हर किसी की यह कामना होती है कि उसके मरने के बाद उसका पुत्र विधि-विधान से श्राद्ध तर्पण करे ताकि संसार में दोबारा जन्म न लेना पड़े।

ये है मान्‍यता...

ये है मान्‍यता...

ऐसी मान्यता है कि जल में तर्पण करने से उसका आहार सीधे हमारे पितरों को मिलता है। प्राणी की उत्पत्ति भी जल से होती है और मरने के पश्चात उसकी अस्थियों को भी जल में ही विसर्जित किया जाता है।

जल को बड़ा ही पवित्र माना गया है। जल ही जीवन है- के कारण भी जल की महत्ता से इनकार नहीं किया जा सकता। जल को ही बह्म मानते हुए उसे अन्तिम स्थान माना गया है।

वेदों व पुराणों ने भी जल को ही सबसे श्रेष्ठ माना है। जल से ही शुद्धि और पूर्ण तृप्ति होती है, इसलिए तर्पण हमेशा नदी के किनारे ही होते हैं।

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 इन्‍हें श्राद्ध में जरुर बुलाएं

इन्‍हें श्राद्ध में जरुर बुलाएं

अपने मृत परिजनों के श्राद्ध में बहन, उसके पति और बच्चों यानी भांजे-भांजियों को अवश्य बुलाना चाहिए। यदि वे शहर में नहीं हैं, कहीं दूर रहते हों तो बात अलग है, लेकिन शहर में ही होते हुए उन्हें आमंत्रित करना चाहिए।

English summary

Tarrpn Of Families Along The River, Why?

Tarrpn Of Families Along The River, Why?
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