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कौरवों ने दिया था अधर्म का साथ, मगर फिर भी दुर्योधन को मिला स्वर्ग में स्थान
हिंदू धर्म में मान्यता है कि मनुष्य के कर्म दो भागों में बांटे जाते हैं अच्छे और बुरे, जिन्हें हम पुण्य और पाप कहते हैं। किसी कर्म को करने के पीछे व्यक्ति की क्या सोच है वो काफी अहम होती है। माना जाता है कि दूसरों का बुरा करके पाप करने वाले व्यक्ति को मृत्यु के बाद नरक जाना पड़ता है और वहीं पुण्य कमाने वाला व्यक्ति स्वर्ग जाता है।
मृत्यु के देवता यमराज इस बात का फैसला करते हैं कि व्यक्ति कहां जाएगा। ऐसा लगता है कि अंत में इंसान के अच्छे और बुरे कर्मों के बीच में युद्ध होता है और जो जीतता है उसके अनुसार व्यक्ति की आत्मा स्वर्ग या नरक में जाती है।

महाभारत का युद्ध आज भी लोग याद करते हैं। इस युद्ध का निष्कर्ष यही था कि कौरवों को नरक में भेजा जाए लेकिन उनमें से एक कौरव था जिसे स्वर्ग में जगह मिली थी।
दरअसल ये माना जाता है कि दुर्योधन को मृत्यु के बाद स्वर्ग में स्थान मिला था। पांडवों ने सत्य का साथ दिया और वहीं कौरव अधर्मी कहलाए मगर फिर भी दुर्योधन को स्वर्ग में जगह क्यों मिली? आइए जानने का प्रयास करते हैं कि इसके पीछे क्या वजह रही।

वो था एक उदार और समझदार राजा
दुर्योधन एक नेक और अच्छा राजा था। एक घटना इस बात की पुष्टि भी करती है। इस कथा के अनुसार, युद्ध के बाद दुर्योधन मृत्यु के निकट थे और श्री कृष्ण उनके पास बैठे थे। तब उन्होंने भगवान कृष्ण से कहा था कि मैं हमेशा से ही एक अच्छा राजा रहा और अब मैं मृत्यु के बाद स्वर्ग में जाऊंगा लेकिन कृष्ण तुम शेष जीवन दुःख में बिताओगे। ऐसा कहने के बाद ही दुर्योधन पर आकाश से पुष्प वर्षा हुई। ये घटना बताती है कि दुर्योधन की कही बातें सत्य थी।

दयालु और जमीन से जुड़ी शख्सियत
कर्ण दुर्योधन का सबसे करीबी और विश्वसनीय मित्र था। इस तरह कर्ण की मित्रता दुर्योधन की पत्नी भानुमति से भी थी। एक बार जब दुर्योधन मौजूद नहीं थे तब कर्ण उनकी पत्नी के साथ पासे खेल रहे थे। भानुमति दरवाजे की तरफ मुंह करके बैठी थी और कर्ण की पीठ द्वार की तरफ थी। कर्ण इस खेल में जीत के करीब थे। उसी समय दुर्योधन वहां पहुंचे।
राजा और अपने पति दुर्योधन के द्वार पर आने के कारण भानुमति खड़ी हो गयी। लेकिन कर्ण को लगा कि वो हारने की वजह से खेल को अधूरा छोड़ कर जा रही हैं। उन्हें रोकने के प्रयास में कर्ण ने उनकी साड़ी पकड़ी जिसकी वजह से कढ़ाई में लगे मोती टूट कर गिर गए। ये घटना दुर्योधन को क्रोधित करने के लिए काफी थी लेकिन उन्होंने बहुत शांत ढंग से प्रतिक्रिया दी और कहा कि मैं ये मोती इकट्ठे कर दूं ताकि इन्हें दोबारा लगाया जा सके। ये दिखाता है कि राजा का अपने मित्र और पत्नी पर कितना विश्वास है।

एक निष्पक्ष इंसान
सब लोगों को ये जानकारी नहीं थी कि कर्ण कुंती का पुत्र है। दूसरे लोगों की तरह दुर्योधन को भी लगा कि वह शूद्र जाति से संबंध रखता है। एक बार द्रौपदी ने भी कर्ण के खिलाफ सिर्फ उसकी जाति को लेकर उस वक्त कुछ कहा था जब उसने स्वयंवर में हिस्सा लेना चाहा था। उस वक्त सिर्फ दुर्योधन ने ही कर्ण का साथ दिया था और बचाव करते हुए कहा कि एक योद्धा, एक संत और एक दार्शनिक की कोई जाति या स्रोत नहीं होता है। वो महान पैदा नहीं होते हैं लेकिन महान बनते हैं। ये घटना बताती है कि वो जाति से जुड़े भेदभाव से बहुत ऊपर थे और समानता पर विश्वास करते थे।

शकुनि की गलत नीयत का शिकार हुए थे दुर्योधन
इनके अलावा भी और कई ऐसी घटनाए हैं जो साबित करती हैं कि दुर्योधन एक अच्छे इंसान, मित्र, राजा, पति और पुत्र थे। मगर वो अपने मामा शकुनि की बुरी चालों का शिकार हो गए। शकुनि के मन में बदले कि भावना थी और उसका मकसद धृतराष्ट्र के वंश को खत्म करना था और इसके लिए उसने बड़ी चालाकी से कौरवों को कठपुतलियों की तरह इस्तेमाल किया।
ये भी कहा जाता है कि अपने मामा पर अंध भरोसा रखने के कारण ही दुर्योधन ने ऐसे कदम उठाएं। दुर्योधन को अपनी इन गलतियों के लिए नरक जाना पड़ा जहां उसने अपने हिस्से की सजा भुगती और फिर स्वर्ग में स्थान प्राप्त किया।



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