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Mysuru Dasara: यहां रावण नहीं, महिषासुर का जलाते हैं पुतला, जानें मैसूर दशहरा की 5 दिलचस्प बातें
Mysuru Dasara: दशहरा के दिन शक्ति स्वरूपा माता दुर्गा ने महिषासुर का वध किया था। नौ दिनों तक चले युद्ध के बाद दसवें दिन माता ने इस दुराचारी राक्षस से देवताओं को मुक्ति दिलाई जिसके उपलक्ष्य में हम दशहरा मनाते हैं।
इस दिन यानी दशमी तिथि के दिन अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्र विष्णु के अवतार श्री राम ने रावण का वध किया था। असत्य पर सत्य की इस विजय को विजयदशमी के रूप में मनाया जाता है और रावण का पुतला दहन किया जाता है।

लेकिन एक जगह ऐसी भी है जहां दशहरा के दिन रावण का पुतला ना जला कर महिषासुर का पुतला जलाया जाता है। यहां ना राम होते हैं ना रावण, महिषासुर का पुतला जला कर दशहरा बहुत धूम धाम से मनाया जाता है। ये जगह है कर्नाटक का मैसूर। आपको ये जानकार भी आश्चर्य होगा कि वास्तव में मैसूर का नाम ही महिषासुर राक्षस की वजह से पड़ा है।
मैसूर दशहरा हाल फिलहाल में शुरू किया गया त्यौहार नहीं बल्कि ये बहुत प्राचीन है। कहते हैं मैसूर में दशहरा का आयोजन चौदहवीं शताब्दी से किया जा रहा है। पहले मैसूर विजयनगर साम्राज्य का हिस्सा था। हरिहर और बुक्का नाम के दो योद्धाओं ने विजयनगर साम्राज्य की स्थापना की थी और वे तब भी दशहरा मनाते थे।

इस त्यौहार में देश विदेश से लाखों पर्यटक आते हैं और दस दिनों तक चलने वाले इस रंगारंग कार्यक्रम में गायन, वादन और नृत्य सभी का समागम देखने को मिलता है।
यहाँ चामुंडेश्वरी देवी का मंदिर है जो चामुंडी पहाड़ियों पर स्थित है। नवरात्रि में इस मंदिर को इतना भव्य तरीके से सजाते हैं कि पूरा पहाड़ ही जगमग करता है।

मैसूर का महल बहुत प्राचीन है और बहुत भव्य है। इस महल को भी नब्बे हजार बल्बों से सजाया जाता है। चकमक चमकते महल को देखना एक विहंगम आनंद देता है।
यहां एक शोभायात्रा निकलती है जिसमें लाखों लोग भाग लेते हैं। शोभा यात्रा के दौरान एक हाथी की पीठ पर भारी वजन वाला सोने का बना स्वर्ण मंडप होता है जिसमें माँ दुर्गा की प्रतिमा रखी होती है।
नोट: यह सूचना इंटरनेट पर उपलब्ध मान्यताओं और सूचनाओं पर आधारित है। बोल्डस्काई लेख से संबंधित किसी भी इनपुट या जानकारी की पुष्टि नहीं करता है। किसी भी जानकारी और धारणा को अमल में लाने या लागू करने से पहले कृपया संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें।



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