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Manipur Violence : कौन हैं मणिपुर की ‘मीरा पैबिस’, जो 40 सालों बाद फिर से मशाल थामें सड़कों पर उतरी
Who Is Meira Paibis: मणिपुर में इन दिनों शांति भंग होने के वजह से फिर से हालात बिगड़े हुए है। 40 साल बाद महिलाओं का वो समूह जो खुद को मीरा पैबी कहता है, एक बार फिर अपने उसी अंदाज में सामने सड़कों पर उतार आई है।
मीरा पैबी को 'मणिपुर की टॉर्च बियरर' ('torch-bearing') भी कहा जाता है। यानी वो महिलाएं जो मशाल लेकर चलने के लिए जानी जाती हैं। मणिपुर में महिलाओं की रक्षा करने का दावा करने वाले महिला समूह 'मीरा पैबिस'का इतिहास क्या है और कौन होती है ये महिलाएं? जानिए यहां-

कौन है मीरा पैबिस
मीरा पैबिस, जिन्हें इमास या मणिपुर की माता के रूप में भी जाना जाता है, मैतेई महिलाएं हैं जो इंफाल घाटी में समाज के सभी वर्गों से आती हैं। ये महिलाएं शक्तिशाली नैतिक शक्ति का प्रतिनिधित्व करती हैं। आमतौर पर वरिष्ठ महिलाओं के समूह इसका नेतृत्व करते हैं। वैसे आपको बता दें कि मणिपुर में समाज महिलावादी है। यहां महिलाओं का महत्व हमेशा से ज्यादा रहा है और कमाने और घर चलाने में भी वे पुरुषों से आगे है। मीरा पैबिस को नुपी लाल भी कहा करते थे जिसका मतलब होता है महिलाओं का युद्ध।
मणिपुर में हर महिला बन जाती है मीरा पैबिस
2020 में एशियन रिव्यू ऑफ सोशल साइंसेज में पब्लिश रिसर्च पेपर में भी मीरा पैबीस का जिक्र किया गया है, जिसमें लिखा हुआ है कि कि मणिपुर में हर महिला एक कठिन परिस्थिति के दौरान मीरा पैबीस बन जाती है। स्वतंत्र भारत में, मणिपुर के महत्वपूर्ण महत्व के हर मुद्दे पर हुए आंदोलन का नेतृत्व मीरा पैबिस ने किया, चाहे वह राज्य का दर्जा देने का मामला हो (मणिपुर 1972 में एक राज्य बन गया), मणिपुर को आठवीं अनुसूची में शामिल करने का हो या फिर या शराब पर प्रतिबंध लगा लगाने का मुद्दा हो।

निर्वस्त्र होने की देती है धमकी
खुद को मीरा पैबिस बताने वाली ये महिलाएं जब किसी आंदोलन से जुड़ती है तो दबाव डालने पर स्वयं को निर्वस्त्र करने की धमकी देती हैं। जब सेना की टुकड़ियां पर्वतीय क्षेत्रों में दूसरे गंतव्य की ओर बढ़ती हैं, ये महिलाएं डंडे लेकर रास्ता रोकने के लिए खड़ी हो जाती हैं। ऐसा कई बार हुआ है जब किसी हमले को रोकने या मणिपुर में दो समुदायों के बीच सशस्त्र संघर्ष में हस्तक्षेप के लिए जा सेना जाती है तो महिलाएं आगे खड़ी हो जाती हैं।
मीरा पैबिस का इतिहास
- ब्रिटिश भारत में दो प्रमुख आंदोलनों का जिक्र किया गया जिसमें मीरा पैबिस की भूमिका अहम रही है। पहली बार इन्होंने तब अपनी भूमिका निभाई जब 1904 में कर्नल मैक्सवेल ने पुरुषों को हर 30 दिनों में 10 दिनों का मुफ्त श्रम करना अनिवार्य किया। इसमें मीरा पैबिस के आंदोलन के वजह से मैक्सवेल को बाद में यह आदेश वापस लेना पड़ा।
- दूसरा मामला 1939 में सामने आया, जब महाराजा की आर्थिक नीतियों, मूल्य वृद्धि और राज्य में चावल की कमी होने पर मणिपुर से चावल के निर्यात के विरोध में मीरा पैबिस सड़कों पर उतरीं। उस दौर में अंग्रेजों की तरह महाराजा के तेवर भी नरम पड़ गए।
- 2004 में थांगजम मनोरमा देवी के कथित रेप के बाद 30 मीरा पैबी महिलाओं ने निर्वस्त्र होकर इंफाल सिटी तक मार्च किया था। उनके हाथों में थामे पोस्टर पर लिखा हुआ था, भारतीय सेना ने हमारा रेप किया है।



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