Latest Updates
-
Budh Gochar: सोमवार को शनि के घर में होगी बुध की एंट्री, जागेगी इन राशियों की सोई किस्मत -
Dadi Ma ke Nuskhe: चेहरे के जिद्दी काले दाग होंगे गायब, बस आजमाएं दादी मां के ये 5 असरदार घरेलू नुस्खे -
16 की उम्र में 20 साल बड़े आदमी से शादी, बेटा-बेटी की मौत का गम, दुखों से भरी थी आशा भोसले की जिंदगी -
आशा भोसले का 92 साल की उम्र में निधन, बेटे ने की दुखद खबर की पुष्टि, जानें अंतिम संस्कार का समय -
Akshaya Tritiya से शुरू होगी Char Dham Yatra, अब घर बैठें ऐसे करें बायोमेट्रिक रजिस्ट्रेशन -
Asha Bhosle Net Worth: पीछे छोड़ गईं करोड़ों का साम्राज्य, जानें कितनी संपत्ति की मालकिन थीं आशा भोसले -
Varuthini Ekadashi Kab Hai: इस बार बन रहा दुर्लभ 'चतुर्ग्रही योग', इन 5 राशियों की लगेगी लॉटरी -
Asha Bhosle के परिवार में कौन-कौन? देखें दिग्गज गायिका का पूरा फैमिली ट्री और रिश्तों की कहानी -
Aaj Ka Rashifal 12 April 2026: रविवार को सिंह और मकर राशि की चमकेगी किस्मत, जानें अपना भाग्यफल -
Asha Bhosle को आया कार्डियक अरेस्ट, ICU में भर्ती सिंगर की हालत नाजुक! जानें Cardiac Arrest के लक्षण
Shaheed Diwas 2026: क्यों 23 मार्च को मनाया जाता है शहीद दिवस? जानें इस दिन का इतिहास और महत्व
Shaheed Diwas 2026: हर साल 23 मार्च को शहीद दिवस मनाया जाता है। यह दिन भारत के तीन महान क्रांतिकारियों भगत सिंह, शिवराम राजगुरु और सुखदेव थापर की शहादत की याद में समर्पित है। साल 1931 में इसी दिन अंग्रेजी हुकूमत ने इन तीनों वीरों को फांसी दे दी थी। इन क्रांतिकारियों ने देश की आजादी के लिए अपने प्राण हंसते-हंसते न्यौछावर कर दिए और इतिहास में अमर हो गए। उनका बलिदान आज भी हर भारतीय के लिए प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है। यही वजह है कि हर साल इस दिन को शहीद दिवस के रूप में मनाकर उनके साहस और देशभक्ति को याद किया जाता है। आइए, जानते हैं शहीद दिवस के इतिहास और महत्व के बारे में विस्तार से -

शहीद दिवस क्या है?
हर वर्ष 23 मार्च को शहीद दिवस मनाया जाता है क्योंकि साल 1931 में इसी दिन भगत सिंह, शिवराम राजगुरु और सुखदेव थापर को अंग्रेजी शासन ने फांसी दी थी। शहीद दिवस हमें उनके बलिदान और देशभक्ति की याद दिलाता है। इस मौके पर लोग उन्हें श्रद्धांजलि देते हैं और उनके विचारों से प्रेरणा लेने की कोशिश करते हैं, ताकि देश के प्रति जिम्मेदारी और सम्मान की भावना मजबूत हो सके।
शहीद दिवस का महत्व
शहीद दिवस सिर्फ वीरों को याद करने का दिन नहीं है, बल्कि यह हमें उनके साहस और सोच से सीख लेने का मौका भी देता है। भगत सिंह, शिवराम राजगुरु और सुखदेव थापर ने जिस निडरता के साथ देश के लिए अपना जीवन समर्पित किया, वह आज भी हर भारतीय के लिए प्रेरणा है। यह दिन हमें यह एहसास कराता है कि आजादी आसानी से नहीं मिली, बल्कि इसके लिए अनगिनत बलिदान दिए गए। इसलिए हमें अपने देश की आजादी का सम्मान करना चाहिए और उनके दिखाए रास्ते पर चलने की कोशिश करनी चाहिए।
शहीद दिवस का इतिहास
शहीद दिवस का इतिहास भारत के स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ा हुआ है। यह दिन उन महान क्रांतिकारियों की शहादत की याद दिलाता है, जिन्होंने देश को आजाद कराने के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। भगत सिंह, शिवराम राजगुरु और सुखदेव थापर उस दौर के प्रमुख क्रांतिकारी थे और हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन से जुड़े हुए थे, ब्रिटिश शासन के खिलाफ उनके संघर्ष और गतिविधियों के कारण उन्हें गिरफ्तार किया गया और मुकदमा चलाया गया। इसके बाद 23 मार्च 1931 को इन तीनों वीरों को फांसी दे दी गई, तभी से हर साल इस दिन को शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता है, ताकि उनके साहस, बलिदान और देशभक्ति को याद रखा जा सके।
23 मार्च और 30 जनवरी का शहीद दिवस क्या है?
अक्सर लोगों के मन में यह सवाल आता है कि जब 30 जनवरी को भी शहीद दिवस मनाया जाता है, तो फिर 23 मार्च का महत्व क्या है। दरअसल, इन दोनों तारीखों का अपना अलग-अलग ऐतिहासिक महत्व है। 30 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी की हत्या हुई थी। इसलिए इस दिन को राष्ट्रपिता की याद में शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता है और उन्हें श्रद्धांजलि दी जाती है, 23 मार्च 1931 को भगत सिंह, शिवराम राजगुरु और सुखदेव थापर को अंग्रेजी हुकूमत ने फांसी दी थी। इन तीनों क्रांतिकारियों के बलिदान को सम्मान देने के लिए हर साल 23 मार्च को भी शहीद दिवस मनाया जाता है।
भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव का योगदान
भगत सिंह, शिवराम राजगुरु और सुखदेव थापर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख क्रांतिकारियों में गिने जाते हैं। इन तीनों ने न सिर्फ अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष किया, बल्कि अपने विचारों और साहस से युवाओं में आजादी की भावना भी जगाई। भगत सिंह ने कम उम्र में ही देश की आजादी को अपना लक्ष्य बना लिया था। साल 1929 में उन्होंने असेंबली में बम फेंककर अंग्रेजी सरकार के खिलाफ आवाज उठाई। उनका उद्देश्य किसी को नुकसान पहुंचाना नहीं था, बल्कि देशवासियों को जगाना और अत्याचार के खिलाफ विरोध दर्ज कराना था। इसके अलावा, लाला लाजपत राय की मौत के बाद इन क्रांतिकारियों ने इसका विरोध किया, जिसके चलते उन्हें सॉन्डर्स हत्या कांड में दोषी ठहराया गया। अंततः 23 मार्च 1931 को इन तीनों वीरों को लाहौर जेल में फांसी दे दी गई। उनका बलिदान आज भी देशभक्ति और साहस की मिसाल बना हुआ है, जो आने वाली पीढ़ियों को हमेशा प्रेरित करता रहेगा।



Click it and Unblock the Notifications











